चमोली : थैली वाले दूध ने छीना पहाड़ के पशुपालकों का बाजार!

Team PahadRaftar

स्थानीय दूध के खरीदार घटे, दुग्ध व्यवसाय पर गहराया संकट; पैकेटबंद दूध की गुणवत्ता पर भी उठ रहे सवाल

केएस असवाल, गौचर

उत्तराखंड के पहाड़ों में कभी पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ माना जाता था। अलग राज्य बनने के बाद उम्मीद थी कि खेती और पशुपालन को नई पहचान मिलेगी, लेकिन आज हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। जंगली जानवरों से खेती पहले ही संकट में है, वहीं अब मैदानी क्षेत्रों से आने वाले पैकेटबंद दूध ने पहाड़ के दुग्ध व्यवसायियों के सामने नया आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है।

चमोली जिले के गौचर क्षेत्र सहित रानीगढ़ पट्टी, नागपुर पट्टी, कमेड़ा, नगरासू और शिवानंदी जैसे इलाकों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में दूध बाजार पहुंचता है। इसके बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में विभिन्न कंपनियों का पैकेटबंद दूध भी बड़ी मात्रा में बिक रहा है। नतीजा यह है कि स्थानीय पशुपालकों को अपने शुद्ध दूध के खरीदार नहीं मिल रहे हैं और उन्हें कम कीमत पर दूध बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पशुपालकों का कहना है कि पशु चारा और पशु आहार की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जबकि स्थानीय दूध 60 रुपये प्रति लीटर से अधिक कीमत पर नहीं बिक पा रहा है। दूसरी ओर बाजार में विभिन्न कंपनियों का पैकेटबंद दूध 70 से 72 रुपये प्रति लीटर तक बेचा जा रहा है। ऐसे में दुग्ध उत्पादन की लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पारस, मदर डेयरी, आनंदा, पतंजलि, परम, मधुसूदन, अमूल और आंचल जैसी कंपनियों के दूध ने गांव-गांव तक अपनी पहुंच बना ली है। इससे कई युवाओं द्वारा शुरू की गई छोटी डेयरियां भी घाटे में चली गईं और बंद करनी पड़ीं।

गुणवत्ता पर भी उठ रहे सवाल

गौचर और आसपास के बाजारों में इन दिनों एक और चर्चा जोरों पर है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां एक ओर क्षेत्र के गांवों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में दूध बाजार पहुंच रहा है, वहीं दूसरी ओर उतनी ही मात्रा में पैकेटबंद दूध भी बाहर से आ रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में दूध की खपत कैसे हो रही है।

कुछ लोग पैकेटबंद दूध की गुणवत्ता और शुद्धता को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लोगों का कहना है कि यदि बाजार में इस तरह की शंकाएं हैं तो संबंधित विभागों को समय-समय पर पैकेटबंद दूध की गुणवत्ता और मानकों की जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहे।

सरकारी योजनाएं, लेकिन बाजार नहीं

सरकार दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए अनुदान पर दुधारू पशु उपलब्ध करा रही है और कई योजनाएं संचालित कर रही है। बावजूद इसके यदि उत्पादित दूध को उचित बाजार नहीं मिलेगा तो इन योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।

नौटी की मीना देवी, बैंसोड़ के कमल रावत, बंदरखंड की विजया देवी, उर्मिला धरियाल और ईशमिता गुसाईं का कहना है कि सरकार को स्थानीय दुग्ध उत्पादकों के लिए प्रभावी खरीद व्यवस्था, विपणन नेटवर्क और उचित मूल्य सुनिश्चित करना चाहिए। उनका मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो पहाड़ का पारंपरिक दुग्ध व्यवसाय धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ सकता है।

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