गौचर : कलम से खेत तक : पत्रकार दिग्पाल गुंसाई की दोहरी पहचान बनी प्रेरणा

Team PahadRaftar

कलम से खेत तक : पत्रकार दिग्पाल गुंसाई की दोहरी पहचान बनी प्रेरणा

30 वर्षों से पत्रकारिता के साथ खेती-बाड़ी और गोपालन, नवाचार से बदल रहे कृषि की तस्वीर

केएस असवाल

पत्रकारिता को अक्सर समाज का आईना कहा जाता है, लेकिन जब एक पत्रकार स्वयं खेत में उतरकर खेती करता है तो उसकी कलम में जमीनी सच्चाई और अनुभव दोनों झलकते हैं। चमोली जिले की नगर पालिका गौचर के बंदरखण्ड गांव निवासी वरिष्ठ पत्रकार दिग्पाल गुंसाई इसका सशक्त उदाहरण हैं। पिछले तीन दशकों से वे पत्रकारिता के साथ खेती-बाड़ी और गोपालन को न केवल अपनाए हुए हैं, बल्कि अपने नवाचारों से क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा भी बने हैं।

दिग्पाल गुंसाई का मानना है कि खेत से जुड़ाव ही किसान की वास्तविक समस्याओं को समझने का सबसे बड़ा माध्यम है। मौसम की मार, बीज और खाद की उपलब्धता, उत्पादन लागत और बाजार तक पहुंच जैसी चुनौतियों को उन्होंने स्वयं अनुभव किया है। यही कारण है कि उनकी खबरों में किसानों की आवाज और उनकी वास्तविक समस्याएं प्रमुखता से सामने आती हैं।

उन्होंने खेती में कई प्रयोग किए हैं। लौकी की फसल में फल कम लगने और समय से पहले गिरने की समस्या का समाधान खोजने के लिए पहले पौधों पर घरेलू घोल का प्रयोग किया और बाद में कृत्रिम परागण (हैंड पॉलिनेशन) तकनीक अपनाई। इसके बाद लौकी सहित अन्य बेल वाली सब्जियों का उत्पादन बेहतर होने लगा। पिछले वर्ष उन्होंने धान की तर्ज पर मंडुवा की रोपाई कर अच्छी पैदावार हासिल की, जिसने क्षेत्र के किसानों का भी ध्यान आकर्षित किया।

दिग्पाल ने पहाड़ से बांज के पौधे लाकर गौचर की जलवायु में सफलतापूर्वक विकसित किए, जो अब पशुओं के लिए चारे का स्रोत बन चुके हैं। नींबू के पेड़ों पर कलम विधि अपनाकर वर्षभर फल उत्पादन का प्रयोग भी सफल रहा। वर्तमान में उनके खेतों में पपीता, प्याज, भिंडी, बैंगन, मूली, तोरई, करेला, राई सहित कई प्रकार की सब्जियां उगाई जा रही हैं। उनका कहना है कि रासायनिक खाद का न्यूनतम उपयोग कर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन किया जा सकता है।

खेती के साथ वे गोपालन भी कर रहे हैं। प्रतिदिन 10 लीटर से अधिक दूध का उत्पादन कर स्थानीय बाजार में आपूर्ति करते हैं। इतना ही नहीं, क्षेत्र में किसी पशुपालक की गाय बीमार होने पर अपने अनुभव और पारंपरिक घरेलू उपचार से भी सहयोग करते हैं।

दिग्पाल गुंसाई का मानना है कि मेहनत करने वाले व्यक्ति के लिए खेती आज भी सम्मानजनक रोजगार बन सकती है, लेकिन किसानों को केवल बीज और पशु उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें आधुनिक तकनीक, नियमित प्रशिक्षण, फसलों की सुरक्षा, विपणन और उत्पाद का उचित मूल्य भी मिलना चाहिए। उनका कहना है कि जंगली जानवरों से फसलों को होने वाला नुकसान और दुग्ध उत्पादकों को कम कीमत मिलना आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बड़ी चुनौतियां हैं।

पत्रकारिता और कृषि के इस अनूठे संगम ने दिग्पाल गुंसाई को क्षेत्र में एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है, जो कलम से समाज की आवाज उठाने के साथ खेतों में श्रम कर आत्मनिर्भरता और नवाचार का संदेश भी दे रहा है।

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