गोपेश्वर : चौपाल से चुनावी चौसर तक : चमोली में किसके सिर सजेगा ताज?

Team PahadRaftar

चौपाल से चुनावी चौसर तक : चमोली में किसके सिर सजेगा ताज?

संजय कुंवर पहाड़ रफ्तार 

गोपेश्वर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन चमोली की राजनीति ने रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी है। बदरीनाथ, कर्णप्रयाग और थराली विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी बिसात बिछने लगी है। राजनीतिक दलों ने भले अभी अपने पत्ते नहीं खोले हों, लेकिन संभावित दावेदारों ने गांवों की चौपालों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करानी शुरू कर दी है।

पहाड़ की राजनीति में चुनाव केवल रैलियों से नहीं जीते जाते, बल्कि गांव की चौपाल, चाय की दुकान और स्थानीय मेलों में बनने वाली राय भी जीत-हार तय करती है। यही वजह है कि नेताओं की सक्रियता अब शहरों से ज्यादा गांवों में दिखाई दे रही है।

तीन सीटें… तीन अलग चुनौतियां

चमोली की तीनों विधानसभा सीटों का अपना अलग राजनीतिक मिजाज है। बदरीनाथ में सीमांत क्षेत्र, चारधाम यात्रा और आपदा जैसे मुद्दे प्रभावी रहते हैं। कर्णप्रयाग में क्षेत्रीय संतुलन और स्थानीय नेतृत्व का असर साफ दिखाई देता है, जबकि थराली में सामाजिक समीकरण और ग्रामीण मतदाता चुनाव की दिशा तय करते हैं।

इस बार भी सभी दल इन्हीं समीकरणों को साधने में जुटे हैं।

टिकट की दौड़ हुई तेज

भाजपा, कांग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दलों में टिकट के दावेदार अभी से अपनी ताकत दिखाने लगे हैं। कोई संगठन के कार्यक्रमों में सक्रिय है तो कोई जनसंपर्क अभियान के जरिए जनता के बीच पहुंच बना रहा है। सोशल मीडिया पर भी विकास कार्यों, मुलाकातों और बैठकों की तस्वीरें लगातार साझा की जा रही हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट उसी चेहरे को मिलेगा, जिसकी संगठन और जनता दोनों में मजबूत पकड़ होगी।

बदला-बदला है मतदाता

पहाड़ का मतदाता अब पहले जैसा नहीं रहा। अब वह केवल चुनावी वादों पर भरोसा नहीं करता। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पलायन, पेयजल, आपदा प्रबंधन और पर्यटन जैसे मुद्दों पर ठोस जवाब चाहता है। साथ ही यह भी देख रहा है कि कौन नेता पूरे पांच साल जनता के बीच रहा और कौन केवल चुनाव आते ही सक्रिय हुआ।

दल-बदल और नए समीकरण

उत्तराखंड की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में दल-बदल ने कई नए समीकरण बनाए हैं। ऐसे में चमोली में भी टिकट वितरण के समय कई राजनीतिक चेहरे नई पारी खेलते दिखाई दे सकते हैं। यही वजह है कि सभी दल संभावित नाराजगी और बगावत से बचने की रणनीति भी तैयार कर रहे हैं।

पहाड़ रफ्तार का विश्लेषण

चमोली की राजनीति अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रही है। चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में जनसंपर्क, शक्ति प्रदर्शन, संगठन विस्तार और टिकट की राजनीति और तेज होगी।

आखिरकार सवाल यही है—क्या जनता पुराने चेहरों पर फिर भरोसा करेगी या इस बार बदलाव की नई पटकथा लिखेगी? 

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