चमोली : सावन संक्रांति पर खुले फ्यूला नारायण धाम के कपाट, यहां पुरुष के साथ महिला पुजारी भी करती हैं भगवान नारायण की सेवा

Team PahadRaftar

संजय कुंवर गोपेश्वर। समुद्र तल से करीब 10 हजार फीट की ऊंचाई पर घने जंगलों के बीच स्थित प्राचीन फ्यूला नारायण धाम के कपाट गुरुवार को सावन संक्रांति के पावन पर्व पर विधि-विधान और पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भगवान नारायण के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।

फ्यूला नारायण मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां पुरुष पुजारी के साथ महिला पुजारी भी भगवान नारायण की पूजा-अर्चना और सेवा करती हैं। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

मंदिर में भगवान विष्णु चतुर्भुज स्वरूप में विराजमान हैं। उनके साथ माता महालक्ष्मी, जय-विजय द्वारपाल, क्षेत्रपाल, घंटाकर्ण तथा नंदा-सुनंदा, जग और बंदे देवियों की भी पूजा होती है। यहां आज भी ऋषि परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।

स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान नारायण को ‘सातूं वाड़ी’ का भोग सबसे प्रिय है। कपाट खुलने के अवसर पर सबसे पहले यही भोग अर्पित किया जाता है। मंदिर के कपाट हर वर्ष सावन संक्रांति पर खुलते हैं और नंदा अष्टमी के बाद नवमी तिथि को शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

मंदिर की पूजा व्यवस्था भी अपनी अलग पहचान रखती है। भरकी, भेंटा, पिलखी, गंवाणा और अरोसी गांवों के परिवार बारी व्यवस्था के अनुसार हर वर्ष एक परिवार को पुजारी की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जो पूरे यात्रा काल में भगवान नारायण की सेवा करता है।

ऐसे पहुंचें धाम

ऋषिकेश-बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित हेलंग तक सड़क मार्ग से पहुंचने के बाद लगभग 14 किलोमीटर की दूरी वाहन से तय कर भरकी गांव पहुंचा जा सकता है। यहां से करीब पांच किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद फ्यूला नारायण धाम पहुंचा जाता है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के ठहरने की सामान्य व्यवस्था है। यात्रा के दौरान गर्म कपड़े और जरूरी सामान साथ रखने की सलाह दी जाती है। भरकी गांव से स्थानीय गाइड भी उपलब्ध हो जाते हैं।

घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित फ्यूला नारायण धाम आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है।

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