पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान के लिए देशभर से पहुंच रहे श्रद्धालु, ब्रह्म कपाल में हो रहे धार्मिक अनुष्ठान
संजय कुंवर, बदरीनाथ धाम। पितृ पक्ष की शुरुआत के साथ ही बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की चहल-पहल बढ़ गई है। देश के विभिन्न हिस्सों से तीर्थयात्री अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए बदरीनाथ पहुंच रहे हैं। भगवान बदरी विशाल के दर्शन के बाद श्रद्धालु अलकनंदा नदी के तट पर स्थित ब्रह्म कपाल तीर्थ में तीर्थ पुरोहितों की देखरेख में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करा रहे हैं।

पितृ पक्ष के चलते पिछले दो दिनों से बदरीपुरी में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ी है। ब्रह्म कपाल तीर्थ में सुबह से ही पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान कराने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। तीर्थ पुरोहितों की ओर से परंपरागत विधि-विधान के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराए जा रहे हैं।
पितृ तर्पण से जुड़ी है धार्मिक आस्था
हिंदू धार्मिक परंपरा में बदरीनाथ धाम के ब्रह्म कपाल को पितृ तर्पण और पिंडदान से जुड़े प्रमुख तीर्थों में माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के चलते पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान कराने बदरीनाथ पहुंचते हैं।
धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय तीर्थ परंपरा में ब्रह्म कपाल को विशेष महत्व दिया गया है। एक मान्यता के अनुसार यहां पिंडदान करने के बाद पितरों के निमित्त अन्य स्थान पर पिंडदान की आवश्यकता नहीं रहती। हालांकि यह धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है।
भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा
ब्रह्म कपाल से जुड़ी पौराणिक कथाओं में भगवान शिव का भी उल्लेख मिलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव पर ब्रह्म हत्या का दोष लगा था और इसी क्षेत्र में धार्मिक अनुष्ठान के बाद उन्हें उस दोष से मुक्ति मिली। इसी कथा के आधार पर ब्रह्म कपाल को हिंदू धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में देखा जाता है।

पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालुओं की बढ़ती आवाजाही से बदरीनाथ धाम के बाजारों और तीर्थ क्षेत्र में भी चहल-पहल बढ़ गई है। तीर्थयात्री दर्शन के साथ पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराकर लौट रहे हैं।
