हिमालय का पानी : जंगल कटे तो सूखेंगे जलस्रोत

Team PahadRaftar

ग्लेशियर ही नहीं, जंगल और मिट्टी भी तय करते हैं पहाड़ों के पानी का भविष्य

दिनेश पंत, वरिष्ठ पत्रकार एवं एक्टिविस्ट 

पहाड़ में किसी गांव का सूखता हुआ नौला, कमजोर पड़ता झरना या गर्मियों में कम होती धारा सिर्फ पानी की कमी की कहानी नहीं है। यह उस प्राकृतिक तंत्र में आ रहे बदलाव का संकेत भी है, जिसमें जंगल, मिट्टी, वर्षा, हिमपात, भूजल और जलधाराएं एक-दूसरे से जुड़ी हैं। हिमालय के पानी को बचाने की बहस में अब तक ग्लेशियर और नदियां केंद्र में रहे हैं, लेकिन जंगलों की भूमिका को नजरअंदाज करके हिमालय की जल कहानी पूरी नहीं हो सकती।

विजन हिमालय रिसर्च सेंटर के अनुसार, जंगल और जल का रिश्ता बेहद गहरा है। जंगल पानी बनाते नहीं हैं, लेकिन पानी के जमीन में उतरने, मिट्टी में टिकने और धीरे-धीरे झरनों तथा धाराओं के रूप में बाहर आने की प्राकृतिक प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। यही कारण है कि हिमालयी जल सुरक्षा को जंगलों के संरक्षण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

बारिश की बूंद का पहला पड़ाव जंगल

पहाड़ पर बारिश की एक बूंद सीधे नदी का हिस्सा नहीं बन जाती। पेड़ों की छतरी उसकी गति को कम करती है। पत्तियां, टहनियां और जमीन पर जमा जैविक पदार्थ पानी को रोकते हैं और उसे धीरे-धीरे मिट्टी में पहुंचने का अवसर देते हैं। इसके बाद पानी जमीन के भीतर जाता है और भूजल भंडारों को रिचार्ज करता है।

भूगर्भीय संरचना के अनुसार यही पानी बाद में झरनों, गदेरों और छोटी जलधाराओं के रूप में बाहर आता है। इस पूरी प्रक्रिया में जंगल एक प्राकृतिक नियामक की तरह काम करते हैं।

यानी जंगल पानी का स्रोत भले न हों, लेकिन वे पानी को सहेजने और उसके प्रवाह को नियंत्रित करने वाले प्राकृतिक तंत्र का अहम हिस्सा हैं।

जंगल कम हुए तो पानी का संतुलन बिगड़ेगा

जब पहाड़ी ढलानों से वनस्पति आवरण कम होता है तो बारिश का पानी तेजी से बह सकता है। इससे मिट्टी का कटाव बढ़ता है और ढलानों की स्थिरता प्रभावित होती है। मिट्टी के साथ बहने वाला मलबा जलधाराओं और जलाशयों पर भी असर डाल सकता है।

इसका एक दूसरा असर जलस्रोतों पर पड़ता है। यदि बारिश का पानी पर्याप्त मात्रा में जमीन के भीतर नहीं पहुंच पाएगा तो भूजल का पुनर्भरण प्रभावित होगा। लंबे समय में इसका असर उन झरनों और धाराओं पर पड़ सकता है, जिन पर पर्वतीय गांवों की पेयजल और कृषि व्यवस्था निर्भर करती है।

यहीं से सवाल उठता है—क्या हिमालय के जल संकट को केवल पानी की कमी मानकर हल किया जा सकता है?

ग्लेशियर से आगे की कहानी

हिमालय की नदियों को अक्सर ग्लेशियरों से जोड़कर देखा जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हिमनद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हिमालय का पूरा जल तंत्र केवल ग्लेशियरों पर निर्भर नहीं है।

वर्षा, हिमपात, जंगल, मिट्टी, चट्टानें, भूजल, झरने और नदियां मिलकर इस पूरे तंत्र को बनाते हैं। खासकर स्थानीय जलस्रोतों के लिए वर्षा जल का जमीन में पहुंचना बेहद महत्वपूर्ण है।

इसलिए यदि जल सुरक्षा की रणनीति केवल ग्लेशियरों तक सीमित रही तो पहाड़ के छोटे जलस्रोतों की चुनौती का समाधान नहीं हो पाएगा।

जलस्रोत नहीं, पूरा जलागम बचाना होगा

किसी झरने को पाइप लगाकर बचा लेने भर से उसकी स्थायी सुरक्षा नहीं हो सकती। यह समझना होगा कि उस झरने का पानी आता कहां से है और उसके पीछे कौन-सा जलागम क्षेत्र है।

जलागम क्षेत्र में जंगल, मिट्टी, चट्टान, वनस्पति और भूगर्भीय संरचना मिलकर पानी के संचयन और प्रवाह को प्रभावित करते हैं। इसलिए जलस्रोत संरक्षण की योजनाओं को भी इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ तैयार करना होगा।

झरना बचाना है तो उसका जलागम बचाना होगा और जलागम बचाना है तो जंगल बचाने होंगे।

जंगल पानी की गुणवत्ता के भी प्रहरी

जंगलों की भूमिका सिर्फ पानी की मात्रा तक सीमित नहीं है। वनस्पति और मिट्टी पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया का भी हिस्सा हैं। जंगल मिट्टी को बांधते हैं और पहाड़ी ढलानों को स्थिरता देते हैं।

जंगलों के कमजोर होने से मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है। इसका असर नदियों और जलधाराओं पर पड़ता है। इसलिए जंगलों को केवल कार्बन, वन्यजीव या जैव विविधता के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं है। उनका संबंध सीधे जल सुरक्षा से भी है।

कृषि और गांवों का भविष्य भी इससे जुड़ा

हिमालयी जलस्रोतों का संकट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। पहाड़ की खेती, पशुपालन और ग्रामीण जीवन इन जलस्रोतों पर निर्भर हैं। झरनों में पानी कम होगा तो इसका असर खेतों और गांवों तक पहुंचेगा।

ऐसे में जंगलों का संरक्षण ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ जाता है। हिमालय में जल, जंगल और जमीन को अलग-अलग करके देखने की नीति लंबे समय में प्रभावी नहीं हो सकती।

अब नीति बदलने की जरूरत

हिमालयी जलागम संरक्षण की योजनाओं में वन, मिट्टी, वनस्पति, भूगर्भ और जल को एक साथ लेकर चलना होगा। केवल नए पौधे लगा देना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि प्राकृतिक वनस्पति, मिट्टी और जलागम की पूरी व्यवस्था किस तरह काम कर रही है।

जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम के दौर में यह चुनौती और गंभीर हो गई है। ऐसे में हिमालयी जलस्रोतों को बचाने के लिए स्थानीय स्तर पर जलागम आधारित संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी।

एक ही तंत्र के हिस्से हैं जंगल और जल

हिमालय का पानी किसी एक स्रोत की देन नहीं है। यह प्रकृति के कई घटकों के बीच चलने वाली निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है। जंगल, मिट्टी, जलागम, झरने और नदियां इसी प्रक्रिया की कड़ियां हैं।

हिमालय के जंगल और पानी के रिश्ते को नए सिरे से समझने की जरूरत है। जंगलों को बचाने का अर्थ केवल वन क्षेत्र बचाना नहीं, बल्कि उस मिट्टी और पानी को भी बचाना है, जिस पर हिमालयी जीवन टिका है।

आखिरकार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हिमालय में कितना पानी है। सवाल यह भी है कि वह पानी जमीन में कितना उतर रहा है, कितना सहेजा जा रहा है और कितने समय तक जलधाराओं को जीवित रख पा रहा है।

हिमालय का भविष्य उसके ग्लेशियरों में जितना है, उतना ही उसके जंगलों की मिट्टी में भी छिपा है।

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