फूलों के बीच उछल-कूद करते नजर आ रहा दुर्लभ जीव, पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हिमालयी पिका
संजय कुंवर, गोविंदघाट (चमोली)। विश्व प्राकृतिक धरोहर फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान की जैव विविधता में एक और सुखद तस्वीर सामने आ रही है। दुर्लभ पुष्प प्रजातियों के लिए दुनिया भर में पहचान रखने वाली भ्यूंडार वैली में हिमालयी पिका का कुनबा बढ़ रहा है। फूलों की घाटी से लेकर हेमकुंड साहिब यात्रा मार्ग तक इन दिनों हिमालयी पिका आसानी से नजर आ रहा है। रंग-बिरंगे फूलों और पथरीली पगडंडियों के बीच उछलते-कूदते इस छोटे जीव को देखकर पर्यटक और श्रद्धालु भी रोमांचित हो रहे हैं।
हिमालयी पिका (ओचोटोना हिमालया) खरगोश परिवार का सदस्य है। स्थानीय स्तर पर इसे बिना पूंछ वाला चूहा भी कहा जाता है। पहाड़ी ढलानों और चट्टानी क्षेत्रों में रहने वाला यह जीव हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। घास और पत्तियां इसका प्रमुख भोजन हैं। वनस्पतियों पर निर्भरता के कारण यह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी भूमिका निभाता है।
जलवायु परिवर्तन का संकेतक
हिमालयी पिका को जलवायु परिवर्तन का संकेतक भी माना जाता है। तापमान और पर्यावास में होने वाले बदलाव का असर इसकी गतिविधियों और आवास क्षेत्र पर पड़ सकता है। यही वजह है कि इसके संरक्षण को हिमालयी जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्लास्टिक कचरे से सिकुड़ रहा था आवास
करीब एक दशक पहले हिमालयी पिका को चिंताग्रस्त श्रेणी में शामिल किया गया था। हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्लास्टिक कचरे और ग्लोबल वार्मिंग के कारण इसके प्राकृतिक आवास पर खतरा बढ़ रहा था। ऐसे में फूलों की घाटी और हेमकुंड साहिब क्षेत्र में इसकी बढ़ती मौजूदगी पर्यावरण प्रेमियों के लिए राहत की खबर है।
जैव विविधता के संरक्षण का शुभ संकेत
फूलों की घाटी में हिमालयी पिका की बढ़ती मौजूदगी को क्षेत्र के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि दुर्लभ फूलों के साथ यहां पाए जाने वाले जीव-जंतुओं का संरक्षण भी जरूरी है। हिमालयी पिका जैसे छोटे जीवों की मौजूदगी बताती है कि फूलों की घाटी का प्राकृतिक संसार केवल रंग-बिरंगे फूलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां समृद्ध वन्यजीव विविधता भी फल-फूल रही है।

