
लक्ष्मण नेगी ऊखीमठ। एक ओर सरकार अंतिम गांव तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने और नई शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर विकासखंड ऊखीमठ के सीमांत राजकीय जूनियर हाईस्कूल तोषी की स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े कर रही है। विद्यालय में नियमित शिक्षक नहीं होने से यहां अध्ययनरत छह छात्रों की पढ़ाई गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
विद्यालय के प्रधानाध्यापक के सेवानिवृत्त होने के बाद से यहां कोई नियमित शिक्षक तैनात नहीं किया गया है। शिक्षा विभाग ने फिलहाल गांव के प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक को जूनियर हाईस्कूल का अतिरिक्त प्रभार सौंप रखा है। ऐसे में एक ही शिक्षक दो विद्यालयों की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, जिससे दोनों स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है। नियमित कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं और पाठ्यक्रम भी समय पर पूरा नहीं हो पा रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ के दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा पहले ही संसाधनों और शिक्षकों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में यदि विद्यालय शिक्षकविहीन रहेंगे तो सरकारी स्कूलों के प्रति अभिभावकों का भरोसा कमजोर होना स्वाभाविक है। उनका कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल नई नीतियों और घोषणाओं से नहीं सुधरेगी, बल्कि प्रत्येक विद्यालय में पर्याप्त शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
ग्रामीण गीता राम सेमवाल ने कहा कि विद्यालय में भले ही केवल छह छात्र हों, लेकिन उनका भविष्य किसी भी बड़े विद्यालय के विद्यार्थियों जितना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षक के अभाव में बच्चों की शैक्षणिक नींव कमजोर हो रही है, जिसका असर आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं पर पड़ सकता है।
ग्रामीणों और अभिभावकों ने शिक्षा विभाग से तत्काल नियमित शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो उन्हें शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
क्या कहते हैं अधिकारी
प्रभारी खंड शिक्षा अधिकारी यशवीर सिंह रावत ने बताया कि प्रधानाध्यापक के सेवानिवृत्त होने के बाद विद्यालय में शिक्षकों की कमी बनी हुई है। उन्होंने कहा कि अस्थायी शिक्षक की तैनाती के लिए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव भेजा जाएगा, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो।
पहाड़ रफ्तार की बात
सीमांत क्षेत्रों में शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय भवन तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि स्कूलों में शिक्षक ही नहीं होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे अधूरे रह जाएंगे। छह छात्र हों या साठ, हर बच्चे को समान अवसर और योग्य शिक्षक मिलना शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

