
उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं ग्रामीण
कर्णप्रयाग के सकंड गांव के लोगों ने सरकारी तंत्र को आईना दिखाते हुए शुरू किया श्रमदान
केएस असवाल गौचर/चमोली : उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक होने को हैं। बड़े-बड़े मंचों से ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ को रोकने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती है। एक तरफ जहां सरकारें ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्मार्ट विलेज’ का ढोल पीट रही हैं, वहीं सूबे के सीमांत जिलों के सुदूरवर्ती गांवों में आज भी एक अदद सड़क के लिए ग्रामीणों को अपने खून-पसीने से पहाड़ों का सीना चीरना पड़ रहा है। ताजा मामला चमोली जिले के कर्णप्रयाग विकासखंड के सकंड गांव का है, जहां सिस्टम की अंतहीन बेरुखी से तंग आकर ग्रामीणों ने खुद ही फावड़ा-सबल उठा लिया और सड़क निर्माण के महायज्ञ में जुट गए।
आश्वासनों की घुट्टी और फाइलों का चक्रव्यूह
सकंड गांव के ग्रामीणों की कहानी उत्तराखंड के सैकड़ों अन्य गांवों जैसी ही है। सालों से ग्रामीण जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे। हर बार उन्हें सिर्फ ‘जल्द कार्रवाई’ का आश्वासन मिलता रहा। विडंबना देखिए कि गांव तक सड़क पहुंचाने की फाइल कई बार शासन के गलियारों तक पहुंची, लेकिन हर बार बाबूशाही की ‘तकनीकी आपत्तियों’ के लाल फीताशाही वाले चक्रव्यूह में फंसकर वापस लौट आई।
पहाड़ की इस कठिन भौगोलिक परिस्थिति में सड़क न होना किसी अभिशाप से कम नहीं है। बीमार बुजुर्गों को डोली में लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना हो या गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाना, हर दिन यहां के लोगों के लिए एक अग्निपरीक्षा जैसा होता है। शिक्षा के लिए बच्चों को मिलों पैदल नापना पड़ता है। इसी दर्द और व्यवस्था के खिलाफ उपजे आक्रोश ने ग्रामीणों को एकजुट होने पर मजबूर कर दिया।
अल्टीमेटम बीता, तो शुरू हुआ आत्मनिर्भरता का सफर
ग्रामीणों ने सीधे टकराव के बजाय लोकतांत्रिक तरीका अपनाया। बीते 31 अगस्त को ग्रामीणों ने जिलाधिकारी (DM) को ज्ञापन सौंपकर साफ कह दिया था कि अगर 10 दिनों के भीतर सड़क निर्माण पर कोई ठोस फैसला नहीं हुआ, तो वे खुद काम शुरू कर देंगे। लेकिन कुंभकर्णी नींद में सोए सिस्टम के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। अल्टीमेटम की मियाद खत्म होते ही ग्रामीणों ने तय कर लिया कि अब वे सरकारों के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।
शुक्रवार सुबह करीब साढ़े आठ बजे कुवाणा धार में एक अलग ही नजारा था। ग्रामीणों ने सबसे पहले पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना की। इसके बाद वीरेंद्र सिंह बिष्ट, रघुवीर सिंह बिष्ट, लखमा देवी, दाताराम देवली और उषा देवी सहित 20 से अधिक ग्रामीणों की टोली ने सामूहिक हुंकार भरी और पहाड़ का सीना चीरना शुरू कर दिया। ग्रामीणों के इस जज्बे का असर यह हुआ कि पहले ही दिन करीब 12 मीटर लंबी और चार मीटर चौड़ी सड़क की कटिंग कर डाली गई। पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का कंधे से कंधा मिलाकर फावड़ा चलाना यह साफ बयां कर रहा था कि अब वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
कागजी जवाब और सुलगते सवाल
इस पूरे मामले पर लोनिवि (PWD) गौचर के अधिशासी अभियंता सुनील कुमार का कहना है कि सड़क के प्रथम चरण के सर्वे का एस्टीमेट बनाकर शासन को भेज दिया गया है, स्वीकृति मिलते ही काम शुरू होगा।
अधिकारियों का यह रटा-रटाया जवाब उस व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो कागजों पर तो सरपट दौड़ती है, लेकिन जमीन पर रेंगती नजर आती है। सकंड गांव के ग्रामीणों ने खुद फावड़ा उठाकर न सिर्फ अपनी राह आसान की है, बल्कि नीति-नियंताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर कब तक पहाड़ के लोग अपने बुनियादी हक के लिए इस तरह संघर्ष करते रहेंगे?

