
हीरा बिष्ट गढ़वाली को मिला गौरा देवी पुरस्कार
होम स्टे और ट्रैकिंग के जरिए स्वरोजगार की उम्मीदों को लगाएं पंख, पर्यटकों को देते हैं पर्यावरण संरक्षण का संदेश
चमोली : विश्व पर्यावरण दिवस पर मिलेट वैली उर्गमघाटी में हिमालय के अनमोल हीरा सिंह बिष्ट गढ़वाली को प्रतिष्ठित गौरा देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हीरा बिष्ट को होम स्टे और ट्रैकिंग के जरिए स्वरोजगार करने और पर्यटकों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए प्रतिष्ठित गौरा देवी सम्मान से सम्मानित किया गया।
हिमालय का अनमोल ‘हीरा’, हर कोई है हीरे की सादगी, व्यवहार और अतिथि देवाः भव का कायल
चाय की दुकान से शुरू हुए संघर्ष का एक सफल ट्रेकिंग गाइड तक जा पहुँचा। हिमालय के प्रति सदैव चिंतनशील और जानकारी का अथाह भंडार लिए आज देश के कोने-कोने से हर कोई इस हीरे की सादगी, व्यवहार और अतिथि देवो भव: का कायल है। सीमांत जनपद चमोली के वाण गाँव के ट्रेकिंग गाइड हीरा सिंह बिष्ट ‘गढवाली विगत 16 बरसों से ट्रेकिंग का कार्य कर अपने 8 सदस्यीय परिवार की हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाता आ रहा है। 6 साल पहले पिताजी की असमय मृत्यु नें हीरा को अंदर तक हिला कर रख दिया था क्योंकि हीरा अपने पिताजी के बेहद करीब था। परिवार की जिम्मेदारी नें हीरा को कभी टूटने नहीं दिया। धीरे-धीरे हीरा नें अपने आपको संभाला और एक बार फिर से ट्रेकिंग को रोजगार का जरिया बनाया। आज हीरा के पास मुंबई से लेकर राजस्थान, गुजरात, बैंगलौर, मध्य प्रदेश, बंगाल सहित दर्जनों प्रदेशों के ट्रेकर, ट्रेकिंग के लिए पहुंचते हैं, हीरा केवल पर्यटकों को ट्रैकिंग नहीं कराते हैं वो हिमालय को साफ और सुंदर रखने की दीक्षा भी देते हैं, वे पर्यटकों को पहाड़ों में कूड़ा और गंदगी फेंकने नहीं देते हैं। हर साल आयोजित होने वाली नंदा की वार्षिक जात में वो वेदनी बुग्याल में फैले कचरों को एकत्रित करके लाते हैं और हिमालय को स्वच्छ बनाने में सहयोग करते हैं साथ ही वृक्षारोपण करके हिमालय को हर भरा करते हैं। ट्रैक पूरा करने के बाद पर्यटक हीरा को जादू की झप्पी देना नहीं भूलते। वाण गाँव मे हीरा नाम एक दर्जन से अधिक लोगों के हैं। इसलिए हीरा नें अपना नाम हीरा सिंह बिष्ट ‘गढवाली’ रखा है। और सब लोग हीरा को इसी नाम से जानते और पहचानतें हैं। ट्रैक पूरा करने के बाद पर्यटक हीरा को जादू की झप्पी देना नहीं भूलते
हिमालय जैसा हौंसला!
बेहद साधारण परिवार से तालुक रखने वाले हीरा का बचपन बेहद कठिनाई में बीता। बस जैसे तैसे आठवीं तक की पढ़ाई की। अब आगे पढ़ाई करने के लिए घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। हीरा के पिताजी छोटा मोटा कार्य कर बस किसी तरह से परिवार का गुजर बसर करते थे। हीरा आगे पढना चाहता था तो उसने 8 वीं की ग्रीष्मकालीन अवकाश में सैलानियों को घूमाना शुरू किया। जिससे होने वाली आमदनी से अपनी 12 वीं तक की पढ़ाई जारी रखी साथ ही अपने भाइयों और बहन की पढ़ाई में भी हाथ बटाया। 12 वीं के बाद पिताजी को अच्छा रोजगार मिलने से बीए की पढ़ाई हीरा नें देहरादून से की।
हिमालय के प्रति प्यार खींच लाया वापस, हिमालय की कंदराओं में ढूंढा रोजगार
देहरादून में हीरा का कभी भी मन नहीं लगता था। उसे तो बस अपना पहाड़ ही प्यारा लगता था। बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद हीरा नें देहरादून में रोजगार ढूँढने की जगह वापस अपने गाँव जाने का फैसला किया। गाँव आने के बाद रोजगार के साधन न होने से हीरा मायूस नहीं हुआ। सबसे पहले हीरा नें चाय की दुकान खोली, फिर छोटा सा ढाबा, और पर्यटकों को रहने की व्यवस्था का बोर्ड दुकान के बाहर लगाया। जिससे हीरा की अच्छी खासी आमदनी होने लगी। फोटोग्राफी के शौक ने हीरा को इलाके का फोटोग्राफर बना दिया था। हीरा शादी ब्याह से लेकर अन्य आयोजनों में फोटोग्राफी करने लगा। इस दौरान हीरा नें एक कम्प्यूटर खरीद लिया और कुछ छोटे मोटे कार्य करने लगा। आज हीरा काॅमन सर्विस सेंटर भी चलाता है। जिसमें गांव के लोगों के आवश्यक प्रमाण पत्र बनते हैं। यही नहीं हीरा बुरांश के फूलों से बुरांश का जूस निकालने का कार्य भी करता है।
मन में बसा है हिमालय, आज हैं सफल ट्रैकिंग गाइड
हीरा का मन दुकान में ज्यादा नहीं लगा उसने अपने छोटे भाई नरेंद्र को दुकान पर बैठाया और ट्रेकिंग में हाथ अजमाने की सोची। ट्रैकिंग के लिए सामान की आवश्यकता थी लेकिन आर्थिक तंगी आडे आ गई। थक हारकर बैंक से 35 हजार का कर्ज लिया और पांच टैंट, 10 सिलिपिंग बैग और अन्य सामान खरीदा। जिसके बाद शुरू हुआ हीरा का असली ट्रेकिंग अभियान। शुरू शुरू में दिक्कतों का सामना हुआ लेकिन जो ग्रुप एक बार आया उसने दूसरे ग्रुप की बुकिंग हीरा को दिला दी और हीरा का ट्रेकिंग गाइड का कार्य चल निकला। आज हीरा ट्रेकिंग से एक सीजन में अच्छा खासा मुनाफा कमा लेता है। साथ ही 30 से अधिक लोगों को रोजगार भी दिलाता है। हीरा ट्रेकिंग के जरिए सैलानीयों को बेदनी बुग्याल ,ऑली बुग्याल, रूपकुंड, ब्रह्मताल, भैंकलताल, फूलों की घाटी, पिंडारी ग्लेशियर सहित कई पर्यटक स्थलों का भ्रमण कराता है। जिसमें सैलानियों को स्थानीय परम्परागत भोजन खिलाता है साथ ही पहाड़ की लोकसंस्कृति से रूबरू करवाता है। हीरा पर्यटकों को पहाड़ के परम्परागत खेल, पत्थर-पिडो, बट्टी, लुकाछुपी खिलाते हैं जिसे पर्यटक बेहद पंसद करते है।
होम स्टे के जरिए स्वरोजगार को बढ़ावा, होम स्टे’ को मिला सम्मान, देहरादून में हुऐ सम्मानित
हीरा सिंह बिष्ट होमस्टे को स्वरोजगार का साधन बनाया तो आमदनी भी बढ़ी गांव में पहला होम स्टे बनाया और लोगो को प्रेरित भी किया परिणाम स्वरूप आज गांव सहित पूरी घाटी में लोगों ने सैकड़ों होम स्टे बनाकर स्वरोजगार शुरु किया। हीरा के होम स्टे को राज्य सरकार ने सराहा और उन्हें देहरादून में सम्मानित भी किया गया। आज हीरा सिंह बिष्ट का होमस्टे पर्यटकों की पहली पसंद बन रहा है। रूपकुंड, आली बुग्याल, वेदनी बुग्याल, ब्रह्मताल, मोनाल टाॅप ट्रैक जाने वाले टूरिस्ट इस होमस्टे में ठहर रहें हैं। हीरा सिंह गढवाली का मानना है कि होमस्टे के जरिए लोगो की आर्थिकी स्थिति मजबूत हो रही है और घर में ही रोजगार भी मिल रहा है। होमस्टे में ठहरने वाले पर्यटक भी पहाड की संस्कृति, खान पान को करीब से जान सकेंगे। बकौल हीरा मुझे बचपन से ही पहाड़, बुग्यालो से प्यार रहा है। पहाड़ों मे एक अजीब सा आकर्षण हो जो अपनी ओर खींच ले जाता है। मैंने देहरादून मे पढ़ाई के दौरान निश्चय कर लिया था कि पहाड़ों में ही रोजगार के अवसर सृजन करूँगा। मुझे खुशी है कि मेरा फैसला सही था।
8 साल पहले खोजा निकाला न्यू टूरिज्म डेस्टिनेशन मोनाल टॉप ट्रैक, आज पर्यटकों की पहली पसंद बना मोनाल टॉप ट्रैक
8 साल पहले हीरा सिंह बिष्ट गढ़वाली और वाण गांव के ही ट्रैकर देवेन्द्र बिष्ट नें दुनिया की नजरों से दूर हिमालय में मौजूद प्रकृति की अनमोल गुमनाम नेमत मोनाल ट्रैक को खोज निकाला और दुनिया को इसके बारे में बताया। यहाँ का अभिभूत कर देने वाला अप्रतिम सौंदर्य हर किसी को आनंदित करता है। यहाँ से सनराइज और सर्दियों में विंटर लाइन बेहद रोमांचित करता है। चमोली में इससे ज्यादा खूबसूरत ट्रैकिंग रूट और कोई नहीं है। इस पूरे ट्रैक में आपको हिमालय दर्शन के जरिए हिमालय को करीब से देखने का मौका मिलता है। मोनाल ट्रैक किसी रहस्य और रोमांच से कम नहीं हैं। यहां आकर ऐसा लगता है कि धरती पर अगर कहीं जन्नत है तो वो यहीं हैं। चारों ओर जहां भी नजर दौडाओ हिमालय की केदारनाथ, चौखंभा, नंदा देवी, हाथी घोडा पर्वत, त्रिशूल सहित गगनचुम्बी हिमाच्छादित चोटियों और मखमली घास के बुग्याल के दीदार होते हैं। लगभग साढे बारह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित मोनाल ट्रैक मन को आनंदित कर देता है। यहां से हिमालय की कई पर्वत श्रेणी और मखमली बुग्यालों को देखा जा सकता है। यहां राज्य बृक्ष बुरांस, राज्य पक्षी मोनाल, राज्य पशु कस्तूरी मृग भी देखने को मिलतें हैं। इसके अलावा हजारों प्रकार के फूल और वनस्पति भी रोमांचित कर देती है। हीरा सिंह गढ़वाली कहते हैं कि विगत 8 साल में यहां लगभग 200 से अधिक ग्रुप इसके दीदार के लिए यहां पहुंच चुके हैं। पर्यटकों की मोनाल टॉप ट्रैक पर आमद से स्थानीय लोगों को रोजगार मिला अपितु आर्थिकी भी बढ़ी है। उत्तराखंड पर्यटन विभाग वाण मोनाल टॉप ट्रैक को वर्ष 2026-27 के लिए ‘ट्रैक ऑफ द ईयर’ घोषित करने की तैयारी कर रहा है। अगर ऐसा होता है तो मोनाल टॉप ट्रैक विश्व के पर्यटन मानचित्र पर अपनी पहचान बनाने में सफल साबित होगा जिससे इस घाटी में पर्यटन गतिविधियों को पंख लगेंगे।
हीरा ने दिखाया है कि यदि सच्चे मन, लगन और ईमानदारी से कोई कार्य किया जाय तो सफलता जरूर मिलती है। हिमालय मे रहकर भी रोजगार सृजन किया जा सकता है। हीरा नें दिखा दिया की इस भीड़ में वो क्यों सबसे अलग है और अपनी चमक बिखेरे हुये है। देश के कोने कोने से आने वाले सैलानीयों के लिए इस अनमोल हीरा का विकल्प नहीं है। खुद पहाड़ों की खाक छानने वाले प्रख्यात फोटोग्राफर और पत्रकार स्व. कमल जोशी भी हीरा के मुरीद बन गये थे। चमोली के सुदूरवर्ती गांव वाण में होम स्टे के जरिए रोजगार सृजन की उम्मीदों को पंख लगाते हीरा की कहानी किसी परी कथा से कम नहीं है। हमारी ओर से हीरा को गौरा देवी पुरस्कार मिलने पर बहुत बहुत बधाई।

