पीपलकोटी : बंड भूमियाल और मां नंदा का मिलन देख छलछलाई श्रद्धालुओं की आंखें

Team PahadRaftar

बंड नंदा की डोली किरूली पहुंची, बधाण की नंदा सूना और दशोली की नंदा पगना में रुकी

पहाड़ रफ्तार गोपेश्वर। मां नंदा की बड़ी जात यात्रा की डोलियां छठे दिन गुरुवार को अपने-अपने अगले पड़ावों के लिए रवाना हुईं। बंड की नंदा डोली बंड भूमियाल की थाती किरूली गांव पहुंची, जबकि बधाण की नंदा डोली सूना गांव और दशोली की नंदा डोली पगना गांव पहुंची। जगह-जगह ग्रामीणों ने ध्याण स्वरूप मां नंदा का भव्य स्वागत कर पुष्पवर्षा की और पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया।

बंड की नंदा डोली कम्यार गांव स्थित राजकोटी मंदिर से पोधार और मल्ला किरूली होते हुए बंड भूमियाल मंदिर पहुंची। वहीं मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली डूंगरी गांव से कैरा मैना होते हुए सूना गांव पहुंची। कुरुड़ दशोली की नंदा डोली मटई ग्वाड़ से पगना गांव पहुंची।

मिलन का दृश्य देख भावुक हुए श्रद्धालु

किरूली गांव में बंड भूमियाल और मां नंदा के मिलन का दृश्य बेहद भावुक करने वाला रहा। सैकड़ों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में नंदा के जयकारों और जागरों से बंड भूमियाल का थान गूंज उठा। चांचणी और झुमेलो की सुमधुर धुनों पर श्रद्धालु देर रात तक थिरकते रहे। इस दौरान पूरा क्षेत्र लोकोत्सव के रंग में रंगा रहा।

ग्रामीणों ने मां नंदा को समौण के रूप में खाजा, चूड़ा, बिंदी, चूड़ी, ककड़ी और मुंगरी समेत पारंपरिक सामग्री अर्पित की। ध्याण के रूप में गांव पहुंची मां नंदा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े।

बंड भूमियाल बनाते हैं नंदा के लिए रास्ता

लोक मान्यता के अनुसार चरबंग के भूमियाल और बंड भूमियाल देवता की सुरक्षा के बिना मां नंदा की यात्रा पूरी नहीं होती। वाण से आगे वेदनी कुंड और होमकुंड तक लाटू देवता और ध्योसिंह देवता मां नंदा के भाई, संरक्षक और मार्गदर्शक माने जाते हैं।

मान्यता है कि रूपकुंड से आगे ज्यूरागोली नामक स्थान पर मां नंदा की यात्रा के लिए रास्ता नहीं मिलता। यहां अन्य देवी-देवता भी आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाते हैं। तब बंड भूमियाल अपने अस्त्र कटार से रास्ता बनाते हैं और इसके बाद मां नंदा की यात्रा ताला उलारी, शिला समुद्र होते हुए होमकुंड की ओर आगे बढ़ती है।

लोक मान्यता यह भी है कि ज्यूरागोली में अन्य देवी-देवताओं को कर के रूप में कुछ न कुछ अर्पित करना पड़ता था, लेकिन बंड भूमियाल को कोई कर नहीं देना पड़ता था। यही कारण है कि नंदा की बड़ी जात यात्रा में बंड भूमियाल और मां नंदा के मिलन को विशेष महत्व दिया जाता है।

छंतोलियां भी बढ़ रही कैलाश की ओर

बड़ी जात में शामिल होने के लिए फर्स्वाण फाट क्षेत्र की दर्जनों छंतोलियां भी अपने अगले पड़ावों के लिए रवाना हो गई हैं। शुक्रवार को निजमूला घाटी की दर्जनों छंतोलियों के भी बड़ी जात में शामिल होने के लिए कैलाश की ओर प्रस्थान करने की तैयारी है। यात्रा के आगे बढ़ने के साथ गांव-गांव में नंदा के स्वागत और विदाई का सिलसिला भी जारी है।

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