
संजय कुंवर बदरीनाथ। विश्व प्रसिद्ध श्री बदरीनाथ धाम में बृहस्पतिवार को पारंपरिक धार्मिक उत्सव जेठ पूजै श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। देवताओं के खजांची और बद्रीश पंचायत के अग्रज देव यक्षराज श्री कुबेर भंडारी की उत्सव डोली बदरीनाथ मंदिर से बामणी गांव पहुंची, जहां ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

रिमझिम बारिश के बीच सुबह से ही बामणी गांव के ग्रामीण, श्री कुबेर देवरा समिति के पदाधिकारी, महिला मंगल दल और भजन-कीर्तन मंडलियां बदरीनाथ मंदिर परिसर में जुटने लगी थीं। मंदिर परिसर में पूरे दिन भक्ति गीतों और जयकारों की गूंज सुनाई देती रही। बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों ने भी इस धार्मिक आयोजन में भाग लिया।
दोपहर में भगवान बदरीविशाल को भोग अर्पित किए जाने के बाद मंदिर के रावल अमरनाथ नंबूदरी ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यक्षराज कुबेर की डोली को बामणी गांव के लिए रवाना किया। धर्माधिकारी और वेदपाठियों की मौजूदगी में सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए गए। इसके बाद गाजे-बाजों और भजन-कीर्तन के साथ डोली बामणी गांव पहुंची।
श्री कुबेर देवरा समिति के सचिव राम नारायण भंडारी ने बताया कि बामणी गांव को बदरीनाथ धाम की धार्मिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है। गांव के लोग मंदिर की पूजा व्यवस्था और धार्मिक परंपराओं में हक-हकूकधारी हैं। उन्होंने कहा कि जेठ पूजै उत्सव आराध्य देव और उनकी प्रजा के बीच आत्मीय संबंधों का प्रतीक है।
बामणी गांव में पूजा-अर्चना और पारंपरिक अनुष्ठानों के बाद यक्षराज कुबेर की डोली ने ग्रामीणों को दर्शन दिए। सभी धार्मिक कार्यक्रमों के समापन के बाद डोली दोपहर बाद पुनः श्री बदरीनाथ धाम लौट आई।
परंपरा और आस्था का अनूठा संगम
जेठ पूजै बदरीनाथ धाम की प्राचीन धार्मिक परंपराओं से जुड़ा महत्वपूर्ण उत्सव है। ज्येष्ठ माह में आयोजित होने वाले इस आयोजन में भगवान कुबेर की उत्सव डोली को बदरीनाथ मंदिर से बामणी गांव ले जाया जाता है। पूजा-अर्चना और भोग के बाद डोली पुनः बदरीनाथ मंदिर में विराजमान होती है। यह उत्सव स्थानीय हक-हकूकधारियों, ग्रामीणों और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक माना जाता है।
