ऊखीमठ : 16 साल बाद रांसी गांव में लौटी बगडवाल नृत्य की रौनक, मदमहेश्वर घाटी में भक्तिमय माहौल

Team PahadRaftar

जीतू बगडवाल की वीरगाथा का हो रहा गुणगान, लोक संस्कृति और परंपराओं के साक्षी बन रहे ग्रामीण

लक्ष्मण नेगी ऊखीमठ। भगवती राकेश्वरी की तपस्थली रांसी गांव में 16 वर्षों बाद पारंपरिक बगडवाल नृत्य का आयोजन हो रहा है। सदियों पुरानी लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी इस परंपरा के लौटने से रांसी गांव सहित संपूर्ण मदमहेश्वर घाटी में उत्सव और भक्ति का माहौल है। कड़ाके की ठंड के बावजूद बड़ी संख्या में ग्रामीण आयोजन में पहुंचकर लोक संस्कृति की इस अनूठी परंपरा के साक्षी बन रहे हैं।

बगडवाल नृत्य के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज और लोकगीतों की स्वर लहरियां पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक रंग में रंग रही हैं। लोक कलाकार पारंपरिक गीतों के माध्यम से वीर योद्धा जीतू बगडवाल की शौर्यगाथा का गुणगान कर रहे हैं। नृत्य की प्रस्तुतियों में वीरता, त्याग और साहस के साथ क्षेत्र की पौराणिक मान्यताओं की झलक देखने को मिल रही है।

राजेश्वरी मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष जगत सिंह पंवार ने कहा कि 16 वर्षों बाद गांव में बगडवाल नृत्य का आयोजन होना पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय है। यह परंपरा पूर्वजों की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। आयोजन से गांव में नई ऊर्जा का संचार हुआ है और प्रवासी ग्रामीणों में भी अपनी माटी के प्रति विशेष लगाव देखने को मिल रहा है।

बदरी-केदार मंदिर समिति के पूर्व सदस्य शिव सिंह रावत ने कहा कि बगडवाल नृत्य जैसी लोक परंपराओं का संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी है। ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत और लोकगाथाओं को करीब से जानने का अवसर मिलता है। साथ ही ग्रामीण समाज में आपसी भाईचारा और एकजुटता भी मजबूत होती है।

पूर्व प्रधान कुन्ती नेगी ने बताया कि आयोजन को लेकर रांसी सहित मदमहेश्वर घाटी के विभिन्न गांवों में खासा उत्साह है। दलीप रावत ने कहा कि बगडवाल नृत्य हमारी सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। लंबे अंतराल बाद आयोजन होने से गांव में उत्सव जैसा माहौल है। बुजुर्गों के साथ युवा और बच्चे भी इसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी कर रहे हैं।

शिक्षाविद रविन्द्र भट्ट ने कहा कि ग्रामीणों की सामूहिक सहभागिता से बगडवाल नृत्य के माध्यम से मदमहेश्वर घाटी की समृद्ध लोक संस्कृति और धार्मिक विरासत फिर जीवंत हो रही है। 16 वर्षों बाद लौटी यह सांस्कृतिक रौनक बताती है कि पहाड़ की लोक परंपराएं आज भी जनमानस की आस्था और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।

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