चमोली : 12 साल बाद शिला समुद्र पहुंची मां नंदा की बड़ी जात

Team PahadRaftar

ज्यूराँगौली की पथरीली चढ़ाई ने ली नंदाभक्तों की अग्निपरीक्षा, कठिन राह भी नहीं डिगा पाई आस्था

 पहाड़ रफ्तार, शिला समुद्र

12 साल बाद कैलाश की ओर निकली मां नंदा की बड़ी जात शनिवार को अपने अंतिम रात्रि पड़ाव शिला समुद्र पहुंच गई। पातर नौचयनिया से भगुवाबासा, छेड़ी नाग, रूपकुंड और ज्यूराँगौली की दुर्गम चढ़ाई पार कर नंदा की डोली थाला उलारी होते हुए शिला समुद्र पहुंची। पथरीली राह, खड़ी चढ़ाई और विरल वातावरण ने कदम-कदम पर श्रद्धालुओं की परीक्षा ली, लेकिन मां नंदा के जयकारों के बीच नंदाभक्तों का हौसला नहीं टूटा। साफ मौसम ने भी यात्रा में बड़ी राहत दी।

फाइल फोटो 2014 बड़ी नंदा जात 

शिला समुद्र पहुंचते ही मां नंदा और बंड भूमियाल के जयकारों से उच्च हिमालय गूंज उठा। दिनभर की थकान के बावजूद श्रद्धालुओं के चेहरों पर मां के कैलाश पहुंचने की आस्था और उत्साह साफ दिखाई दिया।

वीडियो 2014 बड़ी जात

ज्यूराँगौली में कठिन हुई राह

पातर नौचयनिया से आगे बढ़ी बड़ी जात भगुवाबासा और छेड़ी नाग होते हुए रूपकुंड पहुंची। यहां से ज्यूराँगौली की चढ़ाई यात्रा का सबसे कठिन पड़ाव बनी। बड़े-बड़े पत्थरों के बीच संकरी और खड़ी राह पर श्रद्धालुओं को संभल-संभलकर कदम बढ़ाने पड़े। कई जगह सांसें थाम देने वाली चढ़ाई थी, लेकिन डोली के साथ चल रहे नंदाभक्तों के जयकारे लगातार गूंजते रहे।

फाइल फोटो 2014

ज्यूराँगौली पार करने के बाद यात्रा थाला उलारी होते हुए शिला समुद्र पहुंची। कठिन परिस्थितियों के बीच साफ मौसम यात्रियों के लिए बड़ी राहत बना रहा।

ज्यूराँगौली में बंड भूमियाल ने बनाया था मार्ग

बड़ी जात में ज्यूराँगौली का विशेष धार्मिक महत्व है। बंड मंदिर समिति के संरक्षक शंभू प्रसाद बताते हैं कि यह उनकी चौथी बड़ी जात है। उन्होंने बताया कि स्थानीय मान्यता के अनुसार रूपकुंड से आगे ज्यूराँगौली में मां नंदा और अन्य देवी-देवताओं के लिए आगे बढ़ने का मार्ग नहीं मिलता था।

मान्यता है कि ऐसे समय बंड भूमियाल अपने अस्त्र-कटार से ज्यूराँगौली में मार्ग बनाते हैं। इसके बाद ही मां नंदा थाला उलारी, शिला समुद्र और होमकुंड की ओर आगे बढ़ती हैं। स्थानीय परंपरा में ज्यूराँगौली का यह प्रसंग मां नंदा और बंड भूमियाल के आत्मीय संबंध का प्रतीक माना जाता है।

जहां नजर जाए, शिलाएं ही शिलाएं

करीब 4,210 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिला समुद्र चारों ओर से विशाल चट्टानों और टूटे हुए पत्थरों से घिरा है। दूर तक फैली शिलाओं के कारण यह पूरा क्षेत्र समुद्र की तरह दिखाई देता है। इसी वजह से इसका नाम शिला समुद्र पड़ा।

अब बड़ी जात यहां से अपने अगले महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर बढ़ेगी। मां नंदा के जयकारों के बीच श्रद्धालुओं की निगाहें कैलाश की ओर टिकी हैं और सदियों पुरानी आस्था कठिन हिमालयी राह पर लगातार आगे बढ़ रही है।

Leave a Reply

Next Post

चमोली : छोटा अमरनाथ टिम्मरसैंण में आईटीबीपी ने रोपे पौधे

11 हजार फीट की ऊंचाई पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश, ग्रामीण भी बने सहभागी केएस असवाल गौचर/चमोली। सीमांत क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए आईटीबीपी की 8वीं वाहिनी गौचर ने नीति घाटी स्थित तिम्मरसैंण महादेव मंदिर परिसर में पौधारोपण किया। समुद्र तल से करीब 11 हजार फीट […]

You May Like