
उत्तराखंड में बदल रही सामाजिक तस्वीर, शहरों से गांवों तक बढ़ रहे कुंवारे युवक
देहरादून/चमोली। उत्तराखंड में विवाह की पारंपरिक सोच तेजी से बदल रही है। कभी कम उम्र में विवाह के लिए पहचाने जाने वाले पहाड़ में अब युवा पहले शिक्षा, नौकरी और आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका असर यह हुआ है कि विवाह की औसत आयु लगातार बढ़ रही है। लेकिन इस बदलाव का दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। करियर बनाने की दौड़ में 30 वर्ष से अधिक उम्र पार कर चुके अनेक युवाओं को अब मनचाही जीवनसंगिनी नहीं मिल पा रही है। यही वजह है कि शहरों से लेकर दूरस्थ गांवों तक बड़ी संख्या में युवक आज भी अविवाहित हैं।
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड में महिलाओं की पहली शादी की औसत आयु 23.8 वर्ष हो चुकी है, जो राष्ट्रीय औसत 22.9 वर्ष से अधिक है। राज्य में अधिकांश महिलाएं 21 वर्ष या उससे अधिक आयु में विवाह कर रही हैं। यह बदलाव शिक्षा, रोजगार और महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी का संकेत माना जा रहा है।
30 पार युवाओं के लिए बढ़ी मुश्किल
सामाजिक जानकारों का कहना है कि रोजगार और करियर बनाने की कोशिश में कई युवक विवाह को लगातार टालते रहते हैं। जब वे 30 से 35 वर्ष की आयु तक पहुंचते हैं तो उनके लिए उपयुक्त जीवनसंगिनी तलाशना कठिन होने लगता है। दूसरी ओर युवतियां भी अब शिक्षित, आर्थिक रूप से सक्षम और अपने करियर के अनुरूप जीवनसाथी चुनने को प्राथमिकता दे रही हैं। ऐसे में विवाह की उम्र बढ़ने के साथ विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।
चमोली जिले के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश डंडरियाल, जिनकी उम्र 30 वर्ष से अधिक हो चुकी है, कहते हैं कि उनके परिवार वाले पिछले दो-तीन वर्षों से उनके लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, लेकिन अब तक उपयुक्त लड़की नहीं मिल पाई है। उनका मानना है कि लड़कियों की घटती संख्या और बदलती सामाजिक परिस्थितियां भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। उन्होंने कहा, “यदि एक-दो वर्षों में रिश्ता तय हो गया तो शादी कर लूंगा, अन्यथा समाज सेवा को ही अपना जीवन समर्पित कर दूंगा।”
गांवों में भी दिख रहा असर
यह स्थिति केवल देहरादून, हल्द्वानी या अन्य शहरों तक सीमित नहीं है। पलायन से प्रभावित पर्वतीय क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में 30 वर्ष से अधिक उम्र के युवक अविवाहित हैं। कई परिवार वर्षों से अपने बेटों के लिए रिश्ते तलाश रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि रोजगार, पलायन, घटती आबादी और बदलती सामाजिक प्राथमिकताएं इस स्थिति के प्रमुख कारण हैं।
बदल रही है विवाह की सोच
रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 54 प्रतिशत आबादी अभी अविवाहित है। विशेषज्ञ इसे केवल देर से विवाह की प्रवृत्ति नहीं, बल्कि समाज में तेजी से बदलती जीवनशैली और प्राथमिकताओं का संकेत मानते हैं। नई पीढ़ी पहले करियर और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना चाहती है, जबकि विवाह को जीवन का दूसरा पड़ाव मान रही है।
नई चुनौती
महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता समाज के लिए सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ ही देर से विवाह, पलायन, घटते लिंगानुपात, रोजगार की चुनौतियां और युवाओं के अविवाहित रहने जैसी नई सामाजिक परिस्थितियां भी उभर रही हैं। आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के सामाजिक ढांचे पर इन बदलावों का व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

