संजय कुंवर ज्योतिर्मठ। यूनेस्को की विश्व प्राकृतिक धरोहर नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क में सात से 28 जून तक चला चतुर्थ नंदादेवी जैव विविधता अनुश्रवण दशकीय अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। अभियान में शामिल वैज्ञानिकों, वन विभाग, आईटीबीपी और एसडीआरएफ की संयुक्त टीम ने उच्च हिमालयी क्षेत्र की जैव विविधता, वनस्पतियों, वन्यजीवों और हिमनदों का अध्ययन कर महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए।

अभियान के दौरान दल ने लाता गांव से सरसोपाताल बेस कैंप तक दुर्गम क्षेत्रों का भ्रमण किया। कैमरा ट्रैप, ड्रोन, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और अन्य आधुनिक तकनीकों की मदद से बुग्यालों, वृक्षरेखा, हिमनदों, दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों का आकलन किया गया।
अध्ययन के दौरान हिमालयी थार, भरल, कस्तूरी मृग, हिमालयी भालू, साइबेरियन वीजल और पाईका प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दिए, जबकि हिम तेंदुआ, हिमालयी रेड फॉक्स, सिरो और हिमालयी मार्टिन की मौजूदगी के अप्रत्यक्ष साक्ष्य मिले। वन्यजीवों की निगरानी के लिए 50 से अधिक कैमरा ट्रैप लगाए गए। टीम ने हिमालयी मोनाल, स्नो कॉक, स्नो पार्ट्रिज, गोल्डन ईगल और लैमरगायर सहित कई दुर्लभ पक्षियों की भी उपस्थिति दर्ज की। साथ ही लाइकेन, औषधीय पौधों, कीट-पतंगों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का भी अध्ययन किया गया।

वापसी के दौरान अध्ययन दल ने लाता गांव में ग्रामीणों से संवाद कर जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान और इको-टूरिज्म में स्थानीय समुदाय की भागीदारी बढ़ाने पर चर्चा की।
अभियान में भारतीय वन्यजीव संस्थान, जीबी पंत हिमालय पर्यावरण संस्थान, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय, उत्तराखंड वन विभाग, आईटीबीपी और एसडीआरएफ के वैज्ञानिक व विशेषज्ञ शामिल रहे। वैज्ञानिक दल का नेतृत्व भारतीय वन्यजीव संस्थान के पूर्व संकायाध्यक्ष एवं निदेशक प्रो. जी.एस. रावत ने किया, जबकि अभियान का संचालन नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क के उप वन संरक्षक अभिमन्यु के निर्देशन में किया गया।
