लोक संस्कृति की साधक हेमा नेगी करासी ने उत्तराखंड के जागरों और लोकगीतों को दिलाई नई पहचान
संजय चौहान
पहाड़ की पगडंडियों, खेत-खलिहानों और लोकजीवन की मिठास से निकले स्वर जब राष्ट्रीय मंच पर गूंजते हैं तो यह केवल किसी कलाकार की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि पूरी संस्कृति का सम्मान बन जाती है। उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोकगायिका हेमा नेगी करासी का वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए चयन इसी गौरवपूर्ण यात्रा का प्रमाण है।
यह सम्मान ऐसे समय में मिला है जब उत्तराखंड का लोक संगीत आधुनिकता की दौड़ में अपनी जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे दौर में हेमा नेगी करासी ने न केवल लोकगीतों और जागर परंपरा को जीवित रखा, बल्कि उसे देश और दुनिया तक पहुंचाने का काम भी किया।
संघर्षों की आग में तपकर बनी पहचान
रुद्रप्रयाग जिले की दशज्यूला-कांडई पट्टी के टुखिंडा गांव में जन्मी हेमा नेगी करासी का जीवन किसी प्रेरणादायक कहानी से कम नहीं है। सीमित संसाधनों और अभावों के बीच पली-बढ़ी हेमा ने बचपन से ही संघर्षों को करीब से देखा। लेकिन कठिन परिस्थितियों ने उन्हें कमजोर करने के बजाय और मजबूत बनाया।
वर्ष 2003 में इंटर कॉलेज कांडई के वार्षिकोत्सव में पहली बार मंच पर गाने वाली यह युवती आज राष्ट्रीय सम्मान तक पहुंच चुकी है। दो दशक से अधिक लंबे सफर में उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पिता से मिली लोक की विरासत
हेमा अक्सर बताती हैं कि लोक संगीत की पहली पाठशाला उनका घर था। उनके पिता स्वर्गीय चंद्र सिंह नेगी जागर, झुमैला, चौंफुला और लोकगीतों के अच्छे जानकार थे। बचपन में उन्हीं से लोक की समझ मिली।
महज चार साल की उम्र में गाया गया उनका पहला गीत आज भी उन्हें याद है। पिता की शाबाशी ने उनके भीतर छिपी गायिका को पहचान दी। बाद में उत्तराखंड के दिग्गज लोक कलाकार नरेंद्र सिंह नेगी, बसंती बिष्ट और प्रीतम भरतवाण से उन्हें प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला।
जब जागर बनी पहचान
उत्तराखंड में लोकगायकों की कमी नहीं रही, लेकिन हेमा ने अपनी अलग पहचान जागर शैली से बनाई। उनकी आवाज में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू और लोक जीवन की सादगी महसूस होती है।
उनके गीत गिर गेंदुवा, मेरी बामणी, मखमली घाघरी, कार्तिक स्वामी, आछरी जागर, संजू का बाबा और गुड्डू का बाबा लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। मंच पर पारंपरिक वेशभूषा में उनकी प्रस्तुति लोक संस्कृति को जीवंत कर देती है।
सात समंदर पार तक पहुंची लोक की गूंज
हेमा नेगी करासी के गीतों की लोकप्रियता उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, चंडीगढ़ और देश के अन्य महानगरों में उनके कार्यक्रमों को खूब सराहा गया है।
विदेशों में भी उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति का परचम लहराया है। इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, दुबई और जापान तक उनकी प्रस्तुतियां पहुंच चुकी हैं। यह किसी भी लोक कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
सम्मानों की लंबी फेहरिस्त
उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार से पहले भी हेमा नेगी करासी को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है। उत्तराखंड सरकार का तीलू रौतेली पुरस्कार, यूथ आइकॉन सम्मान, उत्तराखंड उदय पुरस्कार, कल्याणी सम्मान, केदार घाटी सम्मान और मां नंदा शक्ति सम्मान उनके खाते में दर्ज हैं।
लेकिन संगीत नाटक अकादमी का यह सम्मान उनके करियर का सबसे बड़ा पड़ाव माना जा रहा है।
“यह सम्मान मेरा नहीं, पूरे उत्तराखंड का है”
पुरस्कार के लिए चयनित होने पर हेमा नेगी करासी भावुक हो उठीं। उनका कहना है कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन सभी माताओं, बुजुर्गों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों का है, जिन्होंने हर कदम पर उनका साथ दिया।
वे कहती हैं, “जब संगीत नाटक अकादमी की सूची में अपना नाम देखा तो वर्षों का संघर्ष आंखों के सामने घूम गया। यह सम्मान उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोक संगीत की ताकत का प्रमाण है।”
लोक संस्कृति की नई उम्मीद
आज जब युवा पीढ़ी तेजी से पश्चिमी संगीत की ओर आकर्षित हो रही है, ऐसे समय में हेमा नेगी करासी जैसे कलाकार लोक संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि अगर समर्पण और लगन हो तो पहाड़ की छोटी सी बस्ती से निकली आवाज भी राष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकती है।
हेमा नेगी करासी का यह सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक परंपराओं, जागर संस्कृति और पहाड़ की उस आत्मा का सम्मान है, जो सदियों से गीतों और लोकधुनों में जीवित है।
सच तो यह है कि पहाड़ की कंदराओं से निकली यह आवाज अब राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी।
