उर्गमघाटी : जब देवी नहीं, बेटी बनकर विदा हुई भगवती गौर, उर्गम घाटी में छलक उठीं हजारों आंखें

Team PahadRaftar

शिव संग नंदीकुंड, स्वनूल और सोना शिखर के लिए रवाना हुईं गौरा

जागरों, मांगलिक गीतों और लोकरीतियों के बीच फिर जीवंत हुई उत्तराखंड की अद्भुत लोकसंस्कृति

रिपोर्ट : रघुबीर नेगी
उर्गम घाटी/जोशीमठ

देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा केवल मंदिरों, शिखरों और देवस्थलों में ही नहीं बसती, बल्कि वह बेटियों की विदाई, लोकगीतों की करुण धुन, जागरों की पुकार और मायके की दहलीज पर बहते आंसुओं में भी जीवित है।

ऐसा ही मार्मिक और लोकआस्था से भरा दृश्य एक बार फिर उर्गम घाटी में देखने को मिला, जब भल्ला वंशजों की धियाण भगवती गौरा शिव के साथ नंदीकुंड, स्वनूल और सोना शिखर के लिए मायके से विदा हुईं।

यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि एक बेटी की विदाई, एक संस्कृति की धड़कन और हिमालयी लोकजीवन की आत्मा का सजीव रूप था।

देवग्राम : जहां आज भी बेटी के रूप में विराजती हैं गौरा

उर्गम घाटी के देवग्राम में स्थित गौरा मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि लोकआस्था का वह केंद्र है जहां भगवती गौरा बेटी के रूप में विराजमान हैं।

सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार हर वर्ष चैत्र-वैशाख की षष्ठी तिथि को भगवती की डोली, जिसे स्थानीय बोली में ‘जम्माण’ कहा जाता है, गर्भगृह से बाहर निकाली जाती है। इसके बाद प्रतिदिन एक से आठ तक देवी के फेरे पूरे विधि-विधान और लोकरीति के साथ संपन्न होते हैं।

यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पारिवारिक और सांस्कृतिक संरचना का भी हिस्सा है, जहां देवी को घर की बेटी मानकर उनके हर संस्कार को निभाया जाता है।

आदिकेदार में हुआ शिव-गौरा का दिव्य विवाह

नौवें दिन देवग्राम के आदिकेदार मंदिर में श्री भूमियाल देवता और घंटाकर्ण देवता के सानिध्य में वैदिक मंत्रोच्चार, मांगलिक गीतों, जागरों और लोकधुनों के बीच भगवती गौरा का विवाह महेश्वर भोलेनाथ से संपन्न कराया जाता है।

विवाह के इस दिव्य आयोजन में केवल देवत्व ही नहीं, बल्कि एक पहाड़ी बेटी के विवाह की पूरी सांस्कृतिक संवेदना भी शामिल होती है।
यह वही क्षण है जब लोक और लीलाधर, परंपरा और आध्यात्मिकता, बेटी और देवी एक ही भाव में समाहित हो जाते हैं।

भल्ला परिवार, जो निभाता है मायके का धर्म

देवग्राम के नेगी परिवार, जिन्हें स्थानीय बोली में भल्ला कहा जाता है, भगवती गौरा के मायके की भूमिका निभाते हैं। यही परिवार नौ दिनों तक जम्माण के फेरे, देवी की सेवा-संभार और पारंपरिक अनुष्ठानों का निर्वहन करता है।

इस दौरान उर्गम घाटी की धियाणियां भी दूर-दराज़ क्षेत्रों से मायके पहुंचती हैं। वे देवी को भैटूली स्वरूप च्युड़ा, भुजली और अन्य स्थानीय उत्पाद अर्पित करती हैं। यह दृश्य केवल भेंट का नहीं, बल्कि रिश्तों, लोकस्मृति और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है।

विदाई का वह क्षण, जब देवभूमि की आंखें भीग जाती हैं

भगवती गौरा की विदाई उत्तराखंड की लोकपरंपरा का सबसे मार्मिक और हृदयस्पर्शी पक्ष है।
जैसे ही विदाई का समय आता है, महिलाओं के कंठ भर आते हैं, पुरुषों की आंखें नम हो जाती हैं, और मांगलिक गीतों की धुनों में करुणा उतर आती है

यह दृश्य किसी देवी की औपचारिक यात्रा का नहीं, बल्कि एक बेटी की मायके से ससुराल विदाई का होता है।

लोकरीति में देवी को समझाते हुए कहा जाता है—

“जब आली लाठी भादों मास की दूज की तीथ, त्वै कू बुलोला लाडी मैंत…”

अर्थात —
“पुत्री, जब भादों महीने की दूज आएगी, तब हम तुझे फिर मायके बुलाने तेरे कैलाश आएंगे।”

इन शब्दों में केवल परंपरा नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सामूहिक भावनात्मक संस्कृति सांस लेती है।

उत्तराखंड में देवी केवल पूजनीय नहीं, रिश्ते में भी बसती हैं

उत्तराखंड की सांस्कृतिक चेतना में गौरा, नंदा, सुनंदा, राजराजेश्वरी और कालिंका जैसी देवियां केवल शक्ति का प्रतीक नहीं हैं। वे यहां बेटी, बहू, धियाण, बहन और मां के रूप में भी रची-बसी हैं।

यही कारण है कि यहां देवी की विदाई में घर रोते हैं, गांव ठहर जाता है और लोकगीतों में करुणा बहने लगती है
यह लोकविश्वास ही उत्तराखंड की संस्कृति को बाकी दुनिया से अलग और अद्वितीय बनाता है।

गौरा विदाई के बाद शुरू होता है नंदा-स्वनूल का लोकपर्व

भगवती गौरा की विदाई के बाद उर्गम घाटी के चोपता क्षेत्र में भूमि क्षेत्रपाल घंटाकर्ण के सानिध्य में पंचनाम देवी-देवताओं सहित जागरों के माध्यम से नंदा-स्वनूल को दो दिनों के लिए मायके बुलाया जाता है

पूरी रात जागर गायन होता है।
चार पहर में देव अवतरित होते हैं।
दाकुड़ी-झुमेला की पारंपरिक धुनों से पूरा वातावरण देवमय और लोकमय हो उठता है।

यह दृश्य बताता है कि पहाड़ में धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि लोकजीवन की सांस है।

नंदीकुंड और सोना शिखर के लिए विदा हुई नंदा-स्वनूल

दूसरे दिन भर्की भूमियाल, मां कालिंका, मैद्यूवधार देवी, दाणी समेत पूरा गांव मेले में पहुंचता है। इन्हें स्थानीय परंपरा में ‘न्यूतारू’ कहा जाता है। इसके बाद देव मिलन की परंपरा निभाई जाती है।

इसी दौरान घंटाकर्ण देवता और भर्की भूमियाल द्वारा नंदा-स्वनूल को नंदीकुंड और सोना शिखर के लिए विधि-विधान के साथ विदा किया जाता है।

एक वर्ष नंदा-स्वनूल, दूसरे वर्ष गरुड़ बाल मेला

उर्गम घाटी की यह परंपरा भी अनूठी है कि यहां

  • एक वर्ष नंदा-स्वनूल मेला
  • और दूसरे वर्ष गरुड़ बाल मेला

आयोजित होता है।
इस वर्ष नंदा-स्वनूल देवी का मेला आयोजित किया गया।

यह सिर्फ परंपरा नहीं, उत्तराखंड की सांस्कृतिक आत्मा है

आज जब आधुनिकता के शोर में लोक परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही हैं, ऐसे समय में उर्गम घाटी आज भी अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत को पूरे आत्मसम्मान और जीवंतता के साथ संजोए हुए है।

यहां देवी-देवताओं के अनुष्ठान केवल मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि समाज, रिश्तों, लोकस्मृति, स्त्री-गरिमा और सामूहिक पहचान को जीवित रखने वाली परंपराएं हैं।

यही वजह है कि उर्गम घाटी में देवी की विदाई केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पूरी संस्कृति की धड़कन बन जाती है।

इस अवसर पर रहे मौजूद

इस अवसर पर भूमि क्षेत्रपाल घंटाकर्ण पश्वा महावीर राणा, दांणी पश्वा हीरा सिंह, चंडिका पश्वा चंद्रमोहन सजवाण, नंदा स्वनूल देवी पुजारी प्रताप चौहान, दौलत रावत, पश्वा स्वनूल राजेंद्र पंवार, भरत सिंह सजवाण, जागरवेता शिव सिंह काला, शिव सिंह चौहान, कुंवर सिंह नेगी, संजय सिंह, गोपाल, राकेश नेगी, केदार सिंह चौहान, कुंदन सिंह चौहान, भागवत सिंह, कैलाश, गंगा सिंह, इंद्र सिंह नेगी, राजेंद्र रावत, हर्षवर्धन फर्स्वाण, रणजीत चौहान, आरती देवी, कातकी देवी, पार्वती देवी सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।

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