
हिमालयी प्रकृति-संस्कृति मॉडल सीखने पहुंचे 12 देशों के प्रतिनिधि
औली – गोरसों बुग्याल से पहाड़, प्रकृति और संस्कृति के संगम को समझने पहुंचा अंतरराष्ट्रीय दल
औली/ चमोली : हिमालय की ऊंचाइयों में बसे औली–गोरसों बुग्याल इन दिनों सिर्फ बर्फ और प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर पहाड़ी पारिस्थितिकी और संस्कृति को समझने का केंद्र भी बने हुए हैं। Wildlife Institute of India (WII) के तत्वावधान में विदेश मंत्रालय का 18 सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय दल यहां “ट्रेनिंग ऑन माउंटेन हेरिटेज एंड नेचर–कल्चर लिंकेंज प्रोग्राम के तहत ग्राउंड लेवल अध्ययन के लिए पहुंचा।
यह दल Nanda Devi Biosphere Reserve के बफर ज़ोन में स्थित औली–गोरसों ईको-टूरिज्म ट्रैक पर पहुंचा, जहां उन्हें हिमालयी पारिस्थितिकी, स्थानीय जीवन और सांस्कृतिक विरासत के आपसी संबंधों को प्रत्यक्ष रूप से समझाया गया।
प्रकृति और संस्कृति का जीवंत प्रयोगशाला बना औली
दल का नेतृत्व नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के डीएफओ अभिमन्यु कर रहे थे। उनके साथ वन क्षेत्राधिकारी चेतना कांडपाल, स्थानीय नेचर एक्सपर्ट व बर्ड वॉचर संजय कुंवर और WII की कार्यक्रम समन्वयक मधुमिता सहित विशेषज्ञ टीम मौजूद रही।
गोरसों बुग्याल की ढलानों पर चलते हुए अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने हिमालयी बुग्याल पारिस्थितिकी, दुर्लभ वनस्पतियों, पक्षियों और वन्यजीवों के आवास को नजदीक से देखा। इस दौरान उन्हें यह भी बताया गया कि कैसे ये बुग्याल जल स्रोतों के संरक्षण, जलवायु संतुलन और स्थानीय आजीविका के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
पर्यटन : अवसर और चुनौती दोनों
औली, जो विंटर स्पोर्ट्स के लिए वैश्विक पहचान बना चुका है, यहां सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) पर भी विशेष चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि बढ़ता पर्यटन जहां स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है, वहीं अनियंत्रित गतिविधियां बुग्यालों और जैव विविधता के लिए खतरा भी बन सकती हैं।
प्रतिनिधियों को ईको-टूरिज्म के तहत संचालित नेचर ट्रेल, बर्ड वॉचिंग और स्थानीय सहभागिता आधारित पर्यटन मॉडल की जानकारी दी गई, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ आय के साधन भी पैदा कर रहे हैं।
विश्व धरोहर की समझ
दल को Valley of Flowers National Park और नंदा देवी क्षेत्र के यूनेस्को विश्व धरोहर महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया। यह समझाया गया कि इन क्षेत्रों में संरक्षण और पर्यटन के बीच संतुलन बनाए रखना क्यों जरूरी है।
संस्कृति और पर्वतीय जीवन की झलक
सिर्फ प्रकृति ही नहीं, बल्कि यहां के पारंपरिक जीवन, लोक संस्कृति और संसाधनों के साथ सामंजस्य ने भी अंतरराष्ट्रीय दल को प्रभावित किया। स्थानीय समुदाय किस तरह सीमित संसाधनों में प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीते हैं, यह इस प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
जब मौसम ने भी दिखाया रंग
औली टॉप के पास अचानक हुई हल्की ओलावृष्टि और बर्फबारी ने इस अनुभव को और खास बना दिया। विदेशी प्रतिनिधि इस प्राकृतिक बदलाव को देखकर उत्साहित नजर आए—यह उनके लिए हिमालय का एक जीवंत अनुभव था।
वैश्विक भागीदारी
इस अंतरराष्ट्रीय दल में श्रीलंका, भूटान, घाना, इंडोनेशिया, केन्या, मलेशिया, नेपाल, पापुआ न्यू गिनी, दक्षिण सूडान, ताजिकिस्तान, तंजानिया और वियतनाम सहित कई देशों के वन, पर्यावरण, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालयों से जुड़े अधिकारी शामिल हैं।
हिमालय से दुनिया के लिए संदेश
औली–गोरसों का यह ग्राउंड अध्ययन सिर्फ एक भ्रमण नहीं, बल्कि एक संदेश है। अगर पहाड़ों की प्रकृति, संस्कृति और जीवनशैली को समझकर विकास किया जाए, तो सतत भविष्य संभव है।
