
देहरादून : गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने, पहाड़ों से पलायन और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के मुद्दे पर युवा सामाजिक कार्यकर्ता पार्थ रतूड़ी ने सरकार और जनता दोनों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या केवल नेता और अफसर नहीं हैं, बल्कि जनता की चुप्पी और उदासीनता भी है।
पार्थ रतूड़ी ने कहा कि जब तक लोग नेताओं और अधिकारियों को राजा समझकर उनके सामने गिड़गिड़ाते रहेंगे, तब तक आम जनता के मुद्दे पीछे ही रहेंगे। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए की गई थी, लेकिन आज पहाड़ लगातार खाली हो रहे हैं और पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा।
उन्होंने कहा कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण आज भी माताओं और नवजात शिशुओं की मौतें हो रही हैं। यह स्थिति राज्य की विकास नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उनका कहना था कि विकास का मतलब केवल सड़कें और भवन बनाना नहीं, बल्कि पहाड़ के लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराना है।
राजनीतिक रैलियों में भीड़, जनसरोकारों के मुद्दों पर सन्नाटा
पार्थ रतूड़ी ने कहा कि यह विडंबना है कि जब गैरसैंण, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों पर आंदोलन होते हैं तो लोग आगे नहीं आते, लेकिन राजनीतिक दलों की रैलियों और शक्ति प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुट जाती है। उन्होंने कहा कि यदि जनता अपने मुद्दों के लिए स्वयं खड़ी नहीं होगी तो सरकारों की मनमानी बढ़ती जाएगी।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड किसी राजनीतिक दल की देन नहीं, बल्कि राज्य आंदोलन के दौरान शहीद हुए 42 आंदोलनकारियों के बलिदान का परिणाम है। इसलिए नई पीढ़ी को राज्य आंदोलन के इतिहास और उसके मूल उद्देश्यों से परिचित कराना जरूरी है।
103 दिन से जारी है क्रमिक अनशन
पार्थ रतूड़ी ने बताया कि विनोद प्रसाद रतूड़ी के नेतृत्व में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर पिछले 103 दिनों से क्रमिक अनशन जारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि इतने लंबे समय से आंदोलन चलने के बावजूद आम जनता की भागीदारी अपेक्षित स्तर पर नहीं दिख रही है।
उन्होंने लोगों से अपने बच्चों को उत्तराखंड आंदोलन, राज्य की संस्कृति, परंपराओं और शहीदों के योगदान के बारे में बताने की अपील की। साथ ही कहा कि गैरसैंण और पहाड़ों के विकास से जुड़े मुद्दों को जीवित रखने के लिए उनका संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।
