
पीपलकोटी की पिंकी जोशी ने छोटी-सी दुकान से जीता सैकड़ों परिवारों का भरोसा, ईमानदारी और आत्मीय व्यवहार को बनाया कारोबार की पहचान
संजय कुंवर | पीपलकोटी
पहाड़ की पगडंडियों पर जिंदगी की राह आसान नहीं होती। घर-परिवार की जिम्मेदारियां और रोजगार के सीमित अवसर कई बार महिलाओं के सपनों को सीमित कर देते हैं। लेकिन कुछ महिलाएं परिस्थितियों के आगे झुकने के बजाय उनसे ही अपनी राह बना लेती हैं। चमोली जिले के पीपलकोटी की पिंकी जोशी ऐसी ही एक मिसाल हैं, जिन्होंने उच्च शिक्षा के बाद नौकरी का इंतजार करने के बजाय स्वरोजगार चुना और अपनी मेहनत से अलग पहचान बनाई।

अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर पिंकी ने वर्ष 2015-16 में पीपलकोटी पुलिस लाइन के पास एक छोटी-सी परचून की दुकान शुरू की। शुरुआत आसान नहीं थी। बाजार में पहले से कई दुकानें थीं और ग्राहकों का विश्वास जीतने में समय लगा। शुरुआती एक-दो वर्षों में ग्राहक कम आए, लेकिन पिंकी ने धैर्य नहीं खोया। उचित मूल्य, अच्छी गुणवत्ता और आत्मीय व्यवहार को उन्होंने अपने कारोबार की बुनियाद बनाया। धीरे-धीरे उनकी दुकान पर ग्राहकों की संख्या बढ़ती गई और छोटी-सी दुकान सैकड़ों परिवारों के भरोसे का ठिकाना बन गई।
डिग्री के बाद चुनी अपने पैरों पर खड़े होने की राह
वर्ष 2011-12 में शादी के बाद भी पिंकी ने पढ़ाई जारी रखी। गोपेश्वर महाविद्यालय से अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी पहचान बनाने के लिए स्वरोजगार का रास्ता चुना। उनके सामने बड़ी पूंजी या कारोबार का अनुभव नहीं था, लेकिन कुछ करने का हौसला जरूर था।
उन्होंने स्थानीय जरूरत को समझा और परचून की दुकान खोल दी। शुरुआत में ग्राहकों की कमी के बावजूद वह अपने काम में जुटी रहीं। उन्होंने यह समझा कि कारोबार केवल सामान बेचने का नाम नहीं, बल्कि ग्राहक के साथ विश्वास का रिश्ता बनाने की भी कला है।
दुकान छोटी, भरोसे का दायरा बड़ा
पिंकी की दुकान पर आसपास के गांवों से आने वाले परिवारों, विद्यार्थियों और सरकारी कर्मचारियों के परिजनों का जुड़ाव बढ़ता गया। नौरख गांव के कई लोग भी उनके नियमित ग्राहकों में शामिल हैं। धीरे-धीरे दुकान खरीदारी की जगह से आगे बढ़कर आपसी अपनत्व का केंद्र बन गई।
पिंकी की पहचान केवल उचित कीमत और अच्छी गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। जरूरत पड़ने पर वह बुजुर्ग महिलाओं की मदद करती हैं, गैस सिलिंडर भरवाने जैसे कामों में सहयोग देती हैं और सुविधानुसार सामान घर तक पहुंचाती हैं। किराये के कमरों में रहने वाले परिवारों की जरूरतों का भी ध्यान रखती हैं।
यही व्यवहार है कि युवा महिलाएं उन्हें प्यार से ‘पिंकी दी’ कहकर बुलाती हैं। कई लोग फोन पर सामान मंगवा लेते हैं, क्योंकि उन्हें उनकी ईमानदारी और व्यवहार पर भरोसा है। पिंकी ने किसी बड़े प्रचार के बजाय अपने काम और संबंधों से ग्राहकों के बीच जगह बनाई है।
महिला सशक्तीकरण की जमीनी तस्वीर
पिंकी जोशी का सफर बताता है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी हासिल करना नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और हुनर से अवसर तलाशना भी है। पहाड़ के छोटे बाजारों में भी स्थानीय जरूरतों को समझकर स्वरोजगार की संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं। इसके लिए बड़ी शुरुआत से ज्यादा जरूरी है पहल, मेहनत और निरंतरता।
उनकी कहानी उन शिक्षित महिलाओं के लिए भी एक संदेश है, जो रोजगार के सीमित विकल्पों के बीच अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। हर महिला की परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन पिंकी का उदाहरण बताता है कि छोटे स्तर से शुरू किया गया काम भी समय के साथ भरोसे और पहचान का आधार बन सकता है।
नवरात्रि विशेष : शक्ति का एक रूप आत्मनिर्भरता भी
नवरात्रि में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूप शक्ति, साहस और संकल्प के प्रतीक माने जाते हैं। पिंकी जोशी का सफर भी इसी शक्ति का एक व्यावहारिक रूप सामने रखता है। कठिन शुरुआत करने का साहस, विपरीत परिस्थितियों में टिके रहने का धैर्य और अपने श्रम से पहचान बनाने का संकल्प – यही उनकी यात्रा की असली ताकत है।
पीपलकोटी की एक छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ उनका सफर आज सैकड़ों परिवारों के विश्वास से जुड़ा है। डिग्री ने उन्हें शिक्षा दी, हौसले ने शुरुआत कराई और ईमानदारी व आत्मीय व्यवहार ने पहचान दिलाई। पिंकी जोशी की कहानी याद दिलाती है कि आत्मनिर्भरता की इबारत हमेशा बड़े शहरों या बड़ी पूंजी से नहीं लिखी जाती; कभी-कभी इसकी शुरुआत पहाड़ के किसी छोटे बाजार में खुलने वाली दुकान से भी होती है।
