
केदार पंथ के कैमरे में गांव की मिट्टी, पहाड़ी थाली और लोक संस्कृति की तस्वीर, ‘Kedar Pahadi’ से देश-दुनिया तक पहुंच रही उत्तराखंड की पहचान
कमल भंडारी/ अखिलेश सती
कर्णप्रयाग / चमोली । पहाड़ की ढलान पर लहलहाता मडुंआ, खेतों में झंगोरे की बालियां, घर की रसोई से आती कोदे की खुशबू और खेतों में पसीना बहाता किसान… यह तस्वीर कभी उत्तराखंड के गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हुआ करती थी। बदलते समय के साथ पहाड़ की यह तस्वीर धुंधली पड़ रही है। लेकिन चमोली के केदार पंथ अपने कैमरे के जरिए इसी तस्वीर को फिर से जीवंत करने में जुटे हैं।
उन्होंने ‘Kedar Pahadi’ नाम से फेसबुक और यू-ट्यूब चैनल के माध्यम से पहाड़ के गांवों की उस दुनिया को सामने लाने का प्रयास शुरू किया है, जो शहरों की चकाचौंध से दूर आज भी अपनी परंपराओं को संजोए हुए है। उनके कैमरे की नजर केवल खूबसूरत पहाड़ी दृश्यों तक सीमित नहीं है। वह खेतों में काम करते ग्रामीणों, गांव की दिनचर्या, पारंपरिक खान-पान, रहन-सहन और लोक परंपराओं को भी कहानी का हिस्सा बना रहे हैं।
थाली में लौटे पहाड़ का स्वाद
मडुंआ, झंगोरा और कोदा जैसे पारंपरिक अनाज इस मुहिम के केंद्र में हैं। कभी पहाड़ के घरों में इनसे बनने वाले व्यंजन रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा थे। मडुए की रोटी, झंगोरे की खीर और कोदे से बने पारंपरिक पकवान पहाड़ की खाद्य संस्कृति की पहचान रहे हैं। आज बाजार में बदलते खान-पान और आधुनिक जीवनशैली के बीच इन अनाजों की जगह सीमित होती जा रही है।
केदार पंथ सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को यह याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि पहाड़ की असली समृद्धि उसकी जमीन और परंपराओं में छिपी है। उनका संदेश है कि स्थानीय अनाज केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का हिस्सा भी बन सकते हैं।
कैमरे में कैद हो रही गांव की जिंदगी
‘Kedar Pahadi’ के वीडियो में पहाड़ का गांव किसी पर्यटन स्थल की तरह नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की नजर से दिखाई देता है। खेत में काम करते किसान, ग्रामीण महिलाओं की दिनचर्या, पारंपरिक तौर-तरीके, स्थानीय भोजन और गांव का सामान्य जीवन उनके वीडियो को पहाड़ की जीवंत तस्वीर बनाते हैं।
केदार पंथ का मानना है कि किसी संस्कृति को बचाने के लिए केवल उसके बारे में बातें करना पर्याप्त नहीं है। उसे जीना, रिकॉर्ड करना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी जरूरी है। इसी सोच के साथ वह गांवों की उन छोटी-छोटी कहानियों को कैमरे में कैद कर रहे हैं, जिन्हें अक्सर बड़ी खबरों और आधुनिक जीवन की दौड़ में जगह नहीं मिलती।
सोशल मीडिया बना पहाड़ की आवाज
आज सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है। सही इस्तेमाल होने पर यह स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को दुनिया तक पहुंचाने का प्रभावी मंच भी बन सकता है। केदार पंथ इसी संभावना को अपनी मुहिम का आधार बना रहे हैं।
उनकी कोशिश है कि उत्तराखंड के गांवों की पहचान केवल पहाड़, नदियों और पर्यटन स्थलों तक सीमित न रहे। देश-दुनिया यह भी देखे कि इन पहाड़ों में कैसी खेती होती है, लोग क्या खाते हैं, किस तरह जीवन जीते हैं और किन परंपराओं को पीढ़ियों से सहेजते आए हैं।
मिट्टी से जुड़ने का संदेश
केदार पंथ की कहानी केवल एक सोशल मीडिया चैनल की कहानी नहीं है। यह उस दौर में अपनी जड़ों की ओर लौटने की कोशिश है, जब पहाड़ से पलायन और बदलती जीवनशैली के बीच पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संस्कृति भी धीरे-धीरे पीछे छूट रही है।
मडुआ, झंगोरा और कोदा को फिर से पहचान दिलाने की उनकी कोशिश इसी बड़े सवाल से जुड़ती है—क्या विकास की दौड़ में आगे बढ़ते हुए हम अपनी जड़ों को पीछे छोड़ रहे हैं?
केदार पंथ का कैमरा इस सवाल का जवाब देने के बजाय पहाड़ की जमीन से एक तस्वीर सामने रखता है। तस्वीर में वही खेत हैं, वही गांव हैं, वही लोग हैं और वही पारंपरिक अनाज हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब इनकी कहानी गांव की चौपाल तक सीमित नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए देश-दुनिया तक पहुंच रही है।
यही ‘Kedar Pahadi’ की सबसे बड़ी कोशिश है—पहाड़ को केवल दिखाना नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी, थाली और संस्कृति से लोगों को फिर जोड़ना।
