थराली में प्रसूता की मौत : पांच घंटे अस्पताल में इंतजार, रेफर होते-होते थम गई सांसें

Team PahadRaftar

– गायनोकोलॉजिस्ट नहीं होने का हवाला देकर किया रेफर, जांच के आदेश
– पहाड़ की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं पर फिर उठे गंभीर सवाल

गिरीश चंदोला थराली। चमोली जिले के थराली सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में एक प्रसूता की मौत ने उत्तराखंड की पर्वतीय स्वास्थ्य व्यवस्था पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि प्रसव पीड़ा से जूझ रही महिला को सुबह अस्पताल लाने के बावजूद करीब पांच घंटे तक वहीं रखा गया और दोपहर में हायर सेंटर रेफर किया गया। कर्णप्रयाग पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई।

जानकारी के अनुसार, थराली विकासखंड के कुराड़ गांव निवासी 35 वर्षीय सरिता देवी पत्नी नरेंद्र कुमार को सोमवार सुबह करीब 8:30 बजे प्रसव पीड़ा होने पर परिजन सीएचसी थराली लेकर पहुंचे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में कई घंटे तक उपचार चलता रहा, लेकिन समय रहते उन्हें उच्च केंद्र नहीं भेजा गया। दोपहर करीब दो बजे 108 एंबुलेंस से कर्णप्रयाग रेफर किया गया, जहां पहुंचने पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध होते या समय पर रेफर किया जाता तो संभव है कि महिला की जान बचाई जा सकती थी। मृतका अपने पीछे पति और दो छोटे बच्चों को छोड़ गई है।

कुराड़ के पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य भास्कर पांडे ने मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि पहाड़ के अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी लगातार जानलेवा साबित हो रही है, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हो रहा।

उधर, प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि महिला का उपचार डॉ. अमित रुद्र ने किया था। अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ (गायनोकोलॉजिस्ट) उपलब्ध नहीं होने के कारण उसे हायर सेंटर रेफर किया गया। पूरे मामले की जांच कराई जा रही है और जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

कोतवाली प्रभारी विनोद थपलियाल ने बताया कि शव का पंचनामा भरने के बाद पोस्टमार्टम कराया जाएगा। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ अन्य तथ्यों को भी जांच में शामिल किया जाएगा।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक तस्वीर भी सामने लाती है। सवाल यह है कि जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी पहले से ज्ञात है, तो ऐसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं है? जांच से इस मामले की जिम्मेदारी तय होगी, लेकिन तब तक एक परिवार अपनी सबसे बड़ी क्षति झेल चुका है।

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