85 सदस्यीय दल करेगा दुर्लभ वन्यजीवों, ग्लेशियरों और जैव विविधता का अध्ययन, आधुनिक तकनीकों का लिया जाएगा सहारा
संजय कुंवर जोशीमठ। विश्व धरोहर स्थल नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में 7 जून से शुरू होने जा रहा दशकीय जैव-निगरानी अभियान-2026 इस हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की सेहत का बड़ा वैज्ञानिक परीक्षण माना जा रहा है। 28 जून तक चलने वाले इस अभियान में वैज्ञानिकों, वन अधिकारियों, आईटीबीपी और एसडीआरएफ की संयुक्त टीम यह जानने का प्रयास करेगी कि वर्ष 1982 से लागू मानव हस्तक्षेप निषेध नीति (जीरो इंटरफेरेंस पॉलिसी) ने प्रकृति को कितना पुनर्जीवित किया है।
अभियान उत्तराखंड वन विभाग के नेतृत्व में भारतीय वन्यजीव संस्थान, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय, आईटीबीपी और एसडीआरएफ के सहयोग से संचालित किया जाएगा। इसके लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।
नंदा देवी इनर सेंचुरी का मार्ग वर्ष 1934 में खोजा गया था। इसके बाद क्षेत्र में बढ़ी पर्वतारोहण गतिविधियों और मानवीय हस्तक्षेप के कारण यहां की संवेदनशील पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वर्ष 1982 में राष्ट्रीय उद्यान के कोर क्षेत्र को पूरी तरह मानव गतिविधियों से मुक्त कर दिया गया। तब से यहां सीमित अंतराल पर वैज्ञानिक अभियान संचालित कर प्राकृतिक पुनरुत्थान का आकलन किया जाता रहा है।
इस बार का अभियान कई मायनों में विशेष है। वैज्ञानिक हिम तेंदुआ, भरल, हिमालयी मोनाल सहित दुर्लभ वन्यजीवों की मौजूदगी, उच्च हिमालयी वनस्पतियों की स्थिति और ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों का अध्ययन करेंगे। इसके लिए ड्रोन सर्वेक्षण, जीआईएस मैपिंग और आधुनिक निगरानी तकनीकों का उपयोग किया जाएगा।
प्रभागीय वनाधिकारी अभिमन्यु के नेतृत्व में अभियान की रूपरेखा तैयार की गई है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए वन विभाग के 12 कर्मचारियों को आईटीबीपी पर्वतारोहण एवं स्कीइंग संस्थान औली तथा नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी में विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। पहली बार हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक विशेषज्ञों को भी अध्ययन दल में शामिल किया गया है।
अभियान में 30 सदस्यीय कोर टीम के अलावा पोर्टरों सहित कुल 85 लोग भाग लेंगे। पूरे अभियान को ‘मिनिमम फुटप्रिंट’ सिद्धांत के तहत संचालित किया जाएगा। कोर जोन में खच्चरों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा, जबकि अभियान के दौरान उत्पन्न होने वाला प्रत्येक प्रकार का कचरा वापस जोशीमठ लाया जाएगा।
आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए आईटीबीपी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी दल के साथ रहेंगे। इसके अलावा हेली-रेस्क्यू, सैटेलाइट फोन तथा एचएफ-वीएचएफ रेडियो आधारित संचार व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है।
वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि यह अभियान केवल जैव विविधता का दस्तावेजीकरण नहीं करेगा, बल्कि जलवायु परिवर्तन और संरक्षण नीतियों के प्रभावों को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। अभियान से प्राप्त निष्कर्ष भविष्य में नंदा देवी परिक्षेत्र के संरक्षण और प्रबंधन की दिशा तय करने में सहायक होंगे।
