चमोली : अलकनंदा घाटी के शिल्पी जगदम्बा मैठाणी को मिलेगा गौरा देवी सम्मान

Team PahadRaftar

अलकनंदा घाटी का शिल्पी : जिसने पहाड़ के संसाधनों में खोजी रोजगार की नई दुनिया

गौरा देवी सम्मान 2026 से होंगे सम्मानित, तीन दशक से पर्यावरण, हस्तशिल्प और ग्रामीण आजीविका को दे रहे नई दिशा

संतोष सिंह ” कुंवर”

पीपलकोटी (चमोली)। जब पहाड़ में बेरोजगारी, पलायन और सीमित संसाधनों की चर्चा होती थी, तब अलकनंदा घाटी का एक युवा स्थानीय जंगलों, रिंगाल, जड़ी-बूटियों और पारंपरिक ज्ञान में भविष्य तलाश रहा था। उसका विश्वास था कि यदि पहाड़ के संसाधनों को सही दिशा मिले तो गांवों की तस्वीर और तकदीर दोनों बदली जा सकती हैं। आज वही सोच जगदम्बा प्रसाद मैठाणी (जेपी मैठाणी) को उत्तराखंड के अग्रणी समाजसेवियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की कतार में खड़ा करती है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर उर्गमघाटी में आयोजित समारोह में उन्हें गौरा देवी सम्मान 2026 से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है जिसने स्थानीय संसाधनों को रोजगार, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का आधार बनाया।

सरकारी नौकरी छोड़ चुना समाज सेवा का रास्ता

चमोली जिले के नौरख-पीपलकोटी गांव में जन्मे जगदम्बा मैठाणी ने देहरादून के डीबीएस और डीएवी कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने सरकारी सेवा के अवसर भी थे, लेकिन उन्होंने गांव और समाज के लिए काम करने का निर्णय लिया।

वर्ष 1996-97 में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान उन्होंने सामाजिक संस्था एसएफसीआईडी का गठन किया। क्षेत्र में बढ़ती शराब तस्करी और अवैध शराब के खिलाफ महिलाओं और युवाओं के साथ मिलकर आंदोलन छेड़ा। इस संघर्ष के दौरान उन्हें झूठे मुकदमे में जेल भी जाना पड़ा, लेकिन न्यायालय ने बाद में उन्हें पूर्ण रूप से दोषमुक्त कर दिया। इसके बाद भी उन्होंने जनसरोकारों की लड़ाई जारी रखी।

जब पीपलकोटी बना प्रदेश का पहला बायोटूरिज्म केंद्र

वर्ष 2000 के बाद जगदम्बा मेठाणी ने ‘आगाज फेडरेशन’ के माध्यम से स्थानीय संसाधनों पर आधारित आजीविका मॉडल विकसित करने की शुरुआत की। उनके प्रयासों से पीपलकोटी में उत्तराखंड का पहला बायोटूरिज्म पार्क विकसित हुआ।

उस समय जब ग्रामीण पर्यटन और प्रकृति आधारित रोजगार की अवधारणा नई थी, तब उन्होंने ऐसा मॉडल तैयार किया, जहां रिंगाल शिल्प, प्राकृतिक रेशा उत्पाद, फल संरक्षण, नर्सरी, जड़ी-बूटी उत्पादन, ट्रैकिंग और ग्रामीण पर्यटन जैसी गतिविधियां एक साथ संचालित होने लगीं।

आज यह पार्क केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संरक्षण की जीवंत प्रयोगशाला बन चुका है।

रोजगार का जीन बैंक बना बायोटूरिज्म पार्क

पीपलकोटी स्थित बायोटूरिज्म पार्क में देशभर से एकत्रित 17 प्रकार के बांस, सात प्रजातियों के रिंगाल तथा कीवी, पर्सिमन, हेजलनट, पीकन नट, अखरोट, खुमानी, आड़ू, चेस्टनट, रुद्राक्ष और अगरवुड सहित सैकड़ों पौध प्रजातियों का संरक्षण किया गया है।

लगभग ढाई एकड़ क्षेत्र में फैले इस परिसर में 288 से अधिक वनस्पति प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन किया गया है। यहां हर वर्ष हजारों फलदार, चारा, औषधीय और सजावटी पौधे ग्रामीणों को निःशुल्क वितरित किए जाते हैं।

रिंगाल शिल्प को दिलाई नई पहचान

जगदम्बा मेठाणी ने रिंगाल और बांस आधारित हस्तशिल्प को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2003 से 2012 के बीच 780 से अधिक शिल्पकारों को प्रशिक्षण दिया गया, जबकि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से 1100 से अधिक लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा गया।

उनके प्रयासों से टंगणी, बेडूमाथल, किरूली और कुजौं-मैकोट जैसे क्षेत्रों में रिंगाल मास्टर ट्रेनर तैयार हुए। पीपलकोटी में स्थापित रिंगाल एवं काष्ठशिल्प ग्रोथ सेंटर आज अनेक कारीगरों की आजीविका का आधार बना हुआ है।

जड़ी-बूटियों और कंडाली से बढ़ी किसानों की आय

वर्ष 2015 से डाबर इंडिया और जीवंती वेलफेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से औषधीय पौधों के संरक्षण और खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। कचनार, टिमरू, वरुणा, कुटज, लोध्रा, सुगंधबाला, तालिसपत्र और गुलबनफ्शा जैसी प्रजातियों के लाखों पौधे किसानों को निःशुल्क वितरित किए गए हैं।

इसके साथ ही कंडाली और प्राकृतिक रेशा आधारित उत्पादों को बाजार से जोड़कर महिलाओं के लिए घर के आसपास रोजगार के अवसर सृजित किए गए।

पलायन के खिलाफ एक शांत आंदोलन

जगदम्बा मेठाणी का पूरा कार्य किसी सरकारी अभियान की तरह नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की तरह रहा है। उन्होंने युवाओं को जैविक खेती, मधुमक्खी पालन, प्रकृति मार्गदर्शक, होम-स्टे संचालन और स्थानीय उद्यमिता से जोड़ने का कार्य किया।

उनकी पहल का परिणाम है कि अनेक युवा गांव में रहकर ही रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। स्थानीय उत्पादों की मार्केटिंग, ट्रैकिंग मार्गों का विकास और ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

आपदा और कोरोना काल में भी निभाई जिम्मेदारी

वर्ष 1999 के चमोली भूकंप और 2013 की केदारघाटी आपदा के दौरान आगाज फेडरेशन ने राहत एवं पुनर्वास कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 2013 की आपदा के बाद 32 मिड टर्म शेल्टर बनाए गए।

कोरोना महामारी के दौरान हजारों मास्क, सैनिटाइजर और चिकित्सा सामग्री वितरित की गई। साथ ही चमोली जिले के आठ अस्पतालों को ऑक्सीजन सिलेंडर और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराए गए।

देशभर के विद्यार्थियों के लिए बना अध्ययन केंद्र

आज पीपलकोटी का बायोटूरिज्म पार्क देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के विद्यार्थियों के लिए अध्ययन और प्रशिक्षण केंद्र बन चुका है। आईआईएम, आईआईटी, निफ्ट, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और कई विश्वविद्यालयों के छात्र यहां ग्रामीण उद्यमिता और पर्यावरण संरक्षण का व्यावहारिक प्रशिक्षण लेने आते हैं।

सम्मानों से भरी उपलब्धियों की यात्रा

जगदम्बा मैठाणी को अब तक वर्ल्ड बैंक रिकग्निशन अवार्ड, ट्री ऑफ अर्थ अवार्ड, दधीची पीक अवार्ड, उत्तराखंड रत्न सम्मान, ग्रीन वॉरियर सम्मान, कोरोना वॉरियर सम्मान, पर्यावरण सम्मान, डाबर इंडिया जड़ी-बूटी संरक्षण पुरस्कार तथा ‘द प्राइड ऑफ हिमालया’ सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

पहाड़ के भीतर ही खोजा विकास का रास्ता

गौरा देवी सम्मान 2026 जगदम्बा मेठाणी के उस जीवन संघर्ष और दूरदृष्टि की स्वीकृति है, जिसने यह साबित किया कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान भी पहाड़ के भीतर मौजूद है। जरूरत केवल स्थानीय संसाधनों को पहचानने, उन्हें वैज्ञानिक सोच से जोड़ने और समाज को साथ लेकर आगे बढ़ने की है।

अलकनंदा घाटी में जब भी स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आत्मनिर्भरता की बात होगी, जगदम्बा प्रसाद मैठाणी का नाम प्रेरणा के साथ लिया जाएगा।

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