चमोली : सलूड़-डुंग्रा में धूमधाम से सम्पन्न हुआ विश्व धरोहर रम्माण मेला, उमड़ी आस्था की भीड़

Team PahadRaftar

18 तालों पर जीवंत हुई रामायण की कथा

भूमियाल देवता के आशीर्वाद के साथ सम्पन्न हुआ भव्य आयोजन

लोकनृत्य और मुखौटा कला ने दर्शकों को किया मंत्रमुग्ध

संजय कुंवर

ज्योतिर्मठ : चमोली जिले के सलूड़-डुंग्रा गांव में विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर रम्माण मेला इस वर्ष भी हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ सम्पन्न हो गया। मेले में पैनखंडा क्षेत्र सहित दूर-दराज से हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।

रम्माण मेले में ढोल-दमांऊ की थाप पर नृत्य करते हुए 

मेले के समापन अवसर पर भूमियाल देवता ने श्रद्धालुओं को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। इस दौरान भूमि क्षेत्रपाल की पूजा-अर्चना के साथ 18 पत्तर का पारंपरिक नृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। 18 तालों पर रामायण के पात्र राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान का जीवंत मंचन कर दर्शकों को भावविभोर कर दिया गया।

मेले में बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला ने 3 लाख रुपये और ब्लॉक प्रमुख ज्योतिर्मठ अनूप नेगी ने 2.5 लाख रुपये की धनराशि देने की घोषणा की।

आठवीं सदी से चली आ रही परंपरा

सलूड गांव में आयोजित होने वाला यह मेला आठवीं शताब्दी से मनाया जा रहा है। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने धर्म प्रचार के उद्देश्य से इसकी शुरुआत की थी। इसकी अनूठी परंपरा और मुखौटा नृत्य को देखते हुए वर्ष 2009 में यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया।

लोकनृत्यों ने बांधा समां

मेले में ढोल-दमांऊ की थाप पर मोर-मोरनी, बण्या-बाणियांण, ख्यालरी और माल नृत्य ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। रम्माण की खासियत यह है कि इसमें संपूर्ण रामायण की प्रमुख घटनाओं—राम जन्म, सीता स्वयंवर, वन गमन, लंका दहन और राजतिलक—को मुखौटा नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

रम्माण समिति के संयोजक डॉ. कुशल सिंह भंडारी ने बताया कि सलूड़-डुंग्रा का रम्माण अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति और परंपरा के कारण विश्वभर में पहचान बना चुका है। यह मेला न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संजोने का सशक्त माध्यम भी है।

Leave a Reply

You May Like