गौचर : मानसून की पहली फुहार के साथ पनाई-सेरे में लौटी रौनक, खेतों में गूंजने लगी धान रोपाई की परंपरा

Team PahadRaftar

केएस असवाल, गौचर

बुधवार सुबह जैसे ही मानसून की पहली फुहारें गौचर की धरती पर पड़ीं, पनाई-सेरे के खेतों में फिर वही पुरानी रौनक लौट आई। कई दिनों से आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे किसानों ने राहत की सांस ली और देखते ही देखते खेतों में धान की रोपाई शुरू हो गई। कीचड़ से भरे खेतों में महिलाओं की कतारें, हंसी-ठिठोली, आपसी सहयोग और सामूहिक श्रम ने एक बार फिर पहाड़ की जीवंत कृषि संस्कृति को साकार कर दिया।

चमोली जिले का पनाई-सेरा कभी अपनी उपजाऊ कृषि भूमि और धान उत्पादन के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध रहा है। एक दौर ऐसा भी था, जब धान की रोपाई किसी त्योहार से कम नहीं होती थी। गांव के लोग कई दिन पहले से तैयारियां शुरू कर देते थे। रिश्तेदारों और परिचितों को रोपाई में हाथ बंटाने के लिए बुलाया जाता था। बदले में दूसरे दिन वही लोग उनके खेतों में काम करने पहुंचते थे। इस सामूहिक श्रम की परंपरा ने गांवों में भाईचारे और सामाजिक एकजुटता को मजबूत बनाए रखा।

समय के साथ तस्वीर बदली। लगभग तीन दशक पहले पनाई-सेरे की उपजाऊ जमीन का बड़ा हिस्सा हवाई पट्टी निर्माण की भेंट चढ़ गया। इसके बाद तेजी से हुए भवन निर्माण ने भी खेती योग्य भूमि का रकबा घटा दिया। इसके बावजूद यहां के किसानों ने खेती से नाता नहीं तोड़ा। सीमित जमीन पर आज भी धान की खेती पूरे उत्साह के साथ की जा रही है।

हालांकि किसानों की चुनौतियां कम नहीं हैं। गर्मियों में सिंचाई का संकट हर साल गहराता जा रहा है। बढ़ती आबादी के कारण पेयजल स्रोतों पर दबाव बढ़ने से खेतों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाता। जून में धान की नर्सरी को बचाए रखना किसानों के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं होता। यही कारण है कि क्षेत्र के किसान हर वर्ष मानसून की पहली बारिश का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

बारिश शुरू होते ही खेतों में रोपाई का काम तेज हो गया। महिलाएं पारंपरिक अंदाज में धान की पौध रोपती नजर आईं। खेतों में काम के बीच हंसी-मजाक, लोकगीतों की धुन और पारंपरिक पकवानों का स्वाद इस मेहनत को उत्सव में बदल देता है। यही परंपरा आज भी गांव की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखे हुए है।

पनाई-सेरे की कृषि उपलब्धियां भी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। यहां के कई प्रगतिशील किसानों को तत्कालीन पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय ने ‘कृषि पंडित’ की उपाधि से सम्मानित किया था। स्वर्गीय माधो सिंह नेगी, शूर सिंह भंडारी, ज्ञान सिंह कनवासी, मान सिंह कनवासी, भजन सिंह गुसाईं, कैरा सिंह गुसाईं, दीवान सिंह बिष्ट, जसवंत सिंह खत्री, कैरा सिंह खत्री और गोविंद सिंह खत्री जैसे किसानों ने अपनी मेहनत और नवाचार से इस क्षेत्र को विशेष पहचान दिलाई।

आज जब आधुनिकता के दौर में खेती लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पनाई-सेरे के खेत यह संदेश देते हैं कि यदि परंपरा, सामूहिकता और प्रकृति का साथ बना रहे, तो खेती केवल आजीविका नहीं बल्कि समाज की सांस्कृतिक विरासत भी बनी रह सकती है।

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