
मेंहदी की रात गीत से चमके स्थानीय कलाकार, शिक्षक धनपति शाह बने युवाओं की प्रेरणा
गोपेश्वर : पहाड़ की लोक संस्कृति और परंपराओं को नई पहचान दिलाने वाला “मेंहदी की रात” एल्बम गीत इन दिनों लोगों की जुबान पर छाया हुआ है। शादी-ब्याह और पारंपरिक आयोजनों में यह गीत खास आकर्षण बनता जा रहा है। महिलाओं के मेंहदी कार्यक्रम से लेकर बारात स्वागत तक हर समारोह में इसकी गूंज सुनाई दे रही है।
गीत की लोकप्रियता के साथ स्थानीय कलाकारों को भी नया मंच मिला है। इस पहल में शिक्षक धनपति शाह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। शिक्षा के क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के साथ वह अपनी मधुर आवाज के जरिए पहाड़ी लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।
धनपति शाह न केवल स्वयं लोक गीतों को स्वर दे रहे हैं, बल्कि युवा कलाकारों को अवसर देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं। जिला मुख्यालय गोपेश्वर समेत आसपास के क्षेत्रों में हुई गीत की शूटिंग से कई नए कलाकारों को पहचान मिली है। गीत के बोल तैयार करने में स्थानीय कलाकारों के साथ महिला मंगल दल की भी अहम भागीदारी रही।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे गीत पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। संस्कृति प्रेमियों का मानना है कि यदि स्थानीय कलाकारों को इसी तरह मंच मिलता रहा तो पहाड़ी लोक कला राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना सकती है।
धनपति शाह इससे पहले भी 100 से अधिक गीतों को स्वर और शब्द दे चुके हैं। उनके चर्चित गीतों में नंदा देवी राजजात पर आधारित “कुरुड़े की नंदा भवानी”, “तेरी जय-जयकार”, “झंवरी गीत”, “बिराणु रुमाल” और “फूल भवंरा” शामिल हैं। इन गीतों के माध्यम से उन्होंने पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दिलाई है।
“मेंहदी की रात” गीत में सुमित नेगी और शीतल ने अपने अभिनय से गीत को आकर्षक बनाया है। गीत के निर्माता मुन्नी शाह हैं, जबकि निर्देशन की जिम्मेदारी स्थानीय नागरिक दीपक शर्मा ने निभाई। कैमरामैन सूरज नेगी, महिला मंगल दल बडग्वालधार हल्दापानी और अन्य स्थानीय कलाकारों की भी गीत को सफल बनाने में अहम भूमिका रही।

