चमोली : कोलाडुंग्री स्कूल हुआ वीरान, आखिरी पांच बच्चों ने भी छोड़ा साथ

Team PahadRaftar

कोलाडुंग्री स्कूल में ताला : पांच बच्चों के जाने से शून्य हुई छात्र संख्या

शिक्षकों की कमी, पलायन और सिस्टम की उदासीनता ने छीना गांव का स्कूल

केएस असवाल 

कर्णप्रयाग (चमोली) : एक ओर सरकार ‘प्रवेशोत्सव’ के जरिए सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के दावे कर रही है, वहीं कर्णप्रयाग क्षेत्र के कोलाडुंग्री गांव का जूनियर हाईस्कूल अब पूरी तरह खाली हो चुका है। यहां पढ़ रहे अंतिम पांच बच्चों ने भी स्कूल छोड़ दिया, जिसके बाद छात्र संख्या शून्य हो गई और स्कूल पर ताला लगने की नौबत आ गई है।

   वीरान पड़ा जूनियर हाईस्कूल कोलाडुंग्री 

यह सिर्फ एक स्कूल के बंद होने की खबर नहीं, बल्कि पहाड़ के बदलते सामाजिक ढांचे और शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत की कहानी है।

पांच बच्चों के जाने से खत्म हुआ 49 साल का इतिहास

साल 1977 में स्थापित इस विद्यालय में कभी 100 से अधिक छात्र पढ़ते थे। गांव ही नहीं, आसपास के दूरदराज क्षेत्रों से भी बच्चे यहां शिक्षा लेने आते थे। लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए- पहले छात्र संख्या 10 पर पहुंची, फिर 5 रह गई और अब शून्य।

अंतिम झटका तब लगा जब विद्यालय में तैनात चार में से दो शिक्षकों का स्थानांतरण हो गया। पहले से ही सीमित संसाधनों में चल रहे स्कूल के लिए यह झटका भारी पड़ा।

ग्रामीणों की अनसुनी मांग

ग्राम प्रधान सुशील खंडूड़ी का कहना है कि लंबे समय से स्कूल में एक अतिरिक्त शिक्षक की मांग की जा रही थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने बताया कि 1977 में स्थापित यह विद्यालय गांव के लिए बेहद महत्वपूर्ण था और यहां पोलिंग बूथ भी बनाया जाता है।

अभिभावक यशवीर सिंह, जसवंत सिंह, जयंती देवी और लक्ष्मी देवी का कहना है कि उन्होंने तहसील दिवस में भी ज्ञापन देकर समस्या उठाई, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि पहले से ही शिक्षकों की कमी थी और एक शिक्षक के नवंबर में सेवानिवृत्त होने की स्थिति में बच्चों का भविष्य और अधिक असुरक्षित हो जाता।

शिक्षक नहीं, तो स्कूल भी नहीं

गांव के लोगों के अनुसार, जब शिक्षकों की तैनाती सुनिश्चित नहीं हो सकी तो अभिभावकों ने मजबूर होकर अपने बच्चों को छह किलोमीटर दूर अन्य विद्यालय में भेजने का निर्णय लिया। नया शिक्षा सत्र शुरू होने के महज दस दिनों के भीतर सभी पांच बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया।

पलायन और निजी स्कूलों का असर

कोलाडुंगी का यह स्कूल अकेला उदाहरण नहीं है। पहाड़ के कई गांवों में सरकारी स्कूल इसी संकट से गुजर रहे हैं। पलायन के कारण गांवों की आबादी घट रही है, वहीं निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या भी सरकारी विद्यालयों पर असर डाल रही है।

सिर्फ स्कूल नहीं, गांव की धड़कन बंद

गांव का स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं होता, बल्कि वह गांव की सामाजिक गतिविधियों का केंद्र होता है। स्कूल बंद होने का मतलब है- गांव से बच्चों की चहल-पहल का खत्म होना, भविष्य की उम्मीदों का कम होना और धीरे-धीरे गांव का और खाली होना।

नीतियों और जमीनी सच्चाई में फर्क

जहां एक तरफ सरकारी स्तर पर शिक्षा को बढ़ावा देने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शिक्षक की कमी, संसाधनों का अभाव और निगरानी की कमी जैसे मुद्दे इन दावों को कमजोर कर रहे हैं।

अब क्या?

शिक्षा विभाग के अनुसार, ऐसे स्कूलों की समीक्षा की जाएगी और शिक्षकों को अन्य विद्यालयों में समायोजित किया जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ समायोजन से समस्या हल हो जाएगी? या फिर पहाड़ के गांवों में शिक्षा को बचाने के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक योजना बनेगी?

कोलाडुंगी का खाली स्कूल एक चेतावनी है -अगर अब भी ध्यान नहीं दिया गया, तो पहाड़ के कई और स्कूल इसी तरह खामोश हो जाएंगे।

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