ऊखीमठ : फुलारी महोत्सव में गूंजे लोकगीत, परंपराओं की रंगत से सराबोर हुआ पल्द्वाणी

Team PahadRaftar

फुलारी महोत्सव में गूंजे लोकगीत, परंपराओं की रंगत से सराबोर हुआ पल्द्वाणी

21 टीमों की सहभागिता, लोकपर्व फुलदेई की झलकियों ने मोहा जनसमूह • विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले सम्मानित.

लक्ष्मण नेगी 

ऊखीमठ : हिमालयी अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत रूप उस समय देखने को मिला जब पल्द्वाणी गांव में आयोजित फुलारी महोत्सव में लोक संस्कृति अपनी पूरी आभा के साथ बिखर उठी। हिमालयन ग्रामीण संस्था और महिला मंगल दल पल्द्वाणी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में 21 टीमों ने प्रतिभाग कर पारंपरिक लोकगीतों, नृत्यों और धार्मिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लोकपर्व ‘फुलदेई’ की महत्ता को जीवंत कर दिया।

जीआईसी पल्द्वाणी परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और देवी-देवताओं की वंदना के साथ हुआ। इसके बाद महिला मंगल दलों द्वारा प्रस्तुत भजनों, झुमैलो, चांचरी और पारंपरिक नृत्यों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय और उल्लासपूर्ण बना दिया। रंग-बिरंगी वेशभूषा में सजी महिलाएं जब लोकगीतों की स्वर लहरियों पर थिरकीं तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठे।

लोकपर्व की आत्मा : फुलदेई का संदेश

महोत्सव की प्रस्तुतियों में ‘फुलदेई’ पर्व की झलक खास आकर्षण रही। प्रतिभागी दलों ने गीतों और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से इस पर्व के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व को उकेरा—कैसे यह त्योहार प्रकृति के प्रति आभार, समृद्धि की कामना और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

संस्कृति संरक्षण का संकल्प

मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे दीक्षा पार्टीज के चेयरमैन कुलदीप रावत ने कहा कि फुलदेई हमारी पौराणिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और भाईचारे का संदेश देता है। वहीं स्वामी भगवानन्द महाराज ने लोगों से अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया।

सम्मान और सराहना का मंच

महोत्सव केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समाज के उन लोगों को सम्मानित करने का मंच भी बना जिन्होंने कला, शिक्षा, पर्यावरण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य किए हैं। लगभग दो दर्जन समाजसेवियों को सम्मानित कर उनके योगदान को सराहा गया।

जनसहभागिता से बना उत्सव

कार्यक्रम संयोजक दीपा देवी ने बताया कि इस तरह के आयोजन समाज में नई चेतना जगाने का कार्य करते हैं। महोत्सव में क्षेत्र के विभिन्न गांवों से आए महिला मंगल दलों, युवाओं और बुजुर्गों की भारी भागीदारी रही, जिससे यह आयोजन एक जनोत्सव में तब्दील हो गया।

अंत में विजेता टीमों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया और सभी प्रतिभागियों के प्रयासों की सराहना की गई। आयोजकों ने भविष्य में भी इस तरह के सांस्कृतिक आयोजनों को निरंतर जारी रखने का संकल्प लिया।

फुलारी महोत्सव ने एक बार फिर यह साबित किया कि पहाड़ की लोक संस्कृति आज भी जीवंत है जरूरत है तो बस ऐसे मंचों की, जहां परंपराएं सांस ले सकें और नई पीढ़ी उनसे जुड़ सके।

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