जोशीमठ : ब्रह्मकमल लेने नंगे पांव उच्च हिमालय रवाना हुए देव फुलारी

Team PahadRaftar

डांडों गांव में 120 साल पुरानी परंपरा, चार फुलारी 30 किमी पैदल पांगरचूला-कुंवारी बुग्याल के लिए निकले

संजय कुंवर, ज्योतिर्मठ। सीमांत प्रखंड ज्योतिर्मठ में मां नंदा को समर्पित नंदा अष्टमी पर्व की शुरुआत हो गई है। नगर क्षेत्र के डांडों गांव में 19 सितंबर को होने वाली नंदा अष्टमी से पहले बुधवार को चार देव फुलारी नंगे पांव उच्च हिमालय के लिए रवाना हुए। मां नंदा देवी मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक जागरों के बीच रिंगाल की कंडी लेकर फुलारी करीब 30 किलोमीटर दूर पांगरचूला-कुंवारी बुग्याल क्षेत्र में दिव्य पुष्प ब्रह्मकमल लेने निकले।

फुलारी 18 सितंबर को ब्रह्मकमल की कंडी लेकर गांव लौटेंगे। इसके बाद नंदा अष्टमी पर मां नंदा की विशेष पूजा-अर्चना होगी और उन्हें बेटी-ध्याण के रूप में कैलाश स्थित ससुराल के लिए विदा करने की परंपरा निभाई जाएगी।

120 साल से निभा रहे परंपरा

डांडों गांव में देव फुलारी की यह परंपरा करीब 120 वर्ष पुरानी बताई जाती है। इस बार फुलारी के रूप में गए नीरज बिष्ट और कन्हैया बैजवाड़ी बताते हैं कि वे लगातार कई वर्षों से यह दायित्व निभा रहे हैं। उनके अनुसार, नियम-धर्म के तहत नंगे पांव कठिन हिमालयी रास्तों पर चलकर ब्रह्मकमल लाना साधना जैसा अनुभव है। उनका कहना है कि मां नंदा की कृपा से ही उन्हें यह सेवा करने का अवसर मिलता है।

कई गांवों में कायम है परंपरा

ज्योतिर्मठ क्षेत्र में डांडों के अलावा सलूड-डुंगरा, मेरग, परसारी, बड़ागांव और ढाक-तपोवन समेत कई गांवों में नंदा अष्टमी के दौरान देव फुलारी के उच्च हिमालय जाने की परंपरा कायम है। मान्यता है कि फुलारी पवित्र ब्रह्मकमल लेकर लौटते हैं तो उसके साथ मां नंदा के मायके आगमन का प्रतीक जुड़ा होता है। अगले दिन श्रद्धालु उन्हें बेटी की तरह भावुक विदाई देते हैं।

स्थानीय मान्यता में उच्च हिमालय में ब्रह्मकमल के खिलने और तोड़े जाने के बाद निचले हिमालयी क्षेत्रों में ठंड की शुरुआत का संकेत भी माना जाता है।

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