
केएस असवाल चमोली। पहाड़ों में मानसून की पहली अच्छी बारिश केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि किसानों के लिए उम्मीदों का संदेश लेकर आती है। पहली फुहार पड़ते ही सीढ़ीनुमा खेतों में पानी भरने लगता है और इसके साथ ही शुरू हो जाता है रोपणी का पारंपरिक उत्सव। खेतों में महिलाओं के लोकगीत गूंजने लगते हैं और किसान पूरे परिवार के साथ धान की रोपाई में जुट जाते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों में धान की खेती पूरी तरह प्राकृतिक जल स्रोतों, नालों, गधेरों और मानसूनी बारिश पर निर्भर है। बारिश के बिना खेत रोपाई के लायक नहीं बनते। यही कारण है कि आज भी गांवों में रोपाई शुरू करने से पहले स्थानीय आराध्य देवताओं की पूजा-अर्चना की परंपरा जीवित है। ग्रामीण अच्छी वर्षा, भरपूर पैदावार और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
चमोली जिले के ग्राम किलौंडी नारायण में भी मानसून की शुरुआत के साथ भूमियाल देवता की पूजा कर धान की रोपाई का शुभारंभ किया गया। पूर्व प्रधान दीपक असवाल ने बताया कि रोपणी पहाड़ की कृषि संस्कृति का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। देवपूजा के बाद किसान पूरे उत्साह के साथ खेतों में उतरते हैं। यह परंपरा केवल खेती तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और लोक आस्था का भी प्रतीक है।
पूजा में ग्राम प्रधान मीना देवी सजवाण, राकेश सजवाण, हरि सिंह रावत, शिशुपाल सिंह नेगी, रणजीत सिंह नेगी, सुदामा सिंह, संदीप असवाल, मदन सिंह असवाल, नंदन सिंह असवाल, सोबत सिंह, प्रेम सिंह, कलम सिंह, रघुनाथ सिंह, आरती देवी नेगी, मंधोदरी देवी, दिगंबरी देवी, सुलोचना देवी, रीना देवी, शोभा देवी सहित महिला मंगल दल, युवक मंगल दल और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

