
रिंगाल मेन राजेंद्र बड़वाल : जिसने बांस की पतली टहनियों में तलाश ली रोजगार और पर्यावरण संरक्षण की नई राह
रिपोर्ट : विशेष संवाददाता
पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से जुड़ी अनेक विरासतें समय के साथ विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई हैं। आधुनिकता की दौड़ में कई पारंपरिक कलाएं पीछे छूटती चली गईं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने इन विरासतों को बचाने का बीड़ा उठाया। चमोली जिले के किरूली गांव निवासी राजेंद्र बड़वाल ऐसे ही लोगों में शामिल हैं। आज उन्हें लोग प्यार से “रिंगाल मेन” के नाम से जानते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस पर मिलेट वैली उर्गमघाटी में उन्हें प्रतिष्ठित गौरा देवी पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान उन्हें पारंपरिक हस्तशिल्प कला के संरक्षण, रिंगाल आधारित रोजगार को बढ़ावा देने और पर्यावरण संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जा रहा है।
तीन पीढ़ियों से जुड़ी है रिंगाल की कहानी
राजेंद्र बड़वाल के लिए रिंगाल केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत है। उनके दादा ने जिस कला को संजोया, उसे पिता दरमानी बड़वाल ने पिछले पांच दशकों से आगे बढ़ाया और अब राजेंद्र इस विरासत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहे हैं।
करीब 16 वर्षों से वे अपने पिता के साथ रिंगाल शिल्प से जुड़े हैं। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक सोच से जोड़ा और रिंगाल उत्पादों को नया स्वरूप देकर बाजार तक पहुंचाया।
जब परंपरा को मिला आधुनिकता का साथ
एक समय था जब रिंगाल से केवल कुछ पारंपरिक उपयोग की वस्तुएं ही बनाई जाती थीं। लेकिन राजेंद्र बड़वाल ने इस सोच को बदल दिया। उन्होंने रिंगाल से बनने वाले उत्पादों की संख्या बढ़ाकर 200 से अधिक कर दी।
आज उनके हाथों से तैयार लैंप शेड, झूमर, फूलदान, पूजा सामग्री, फाइल फोल्डर, ज्वेलरी, चाय ट्रे, सजावटी सामान, मंदिरों की प्रतिकृतियां और अनेक आधुनिक उत्पाद बाजार में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक डिजाइन और उपयोगिता से जोड़कर उन्होंने नई पीढ़ी को भी इस कला की ओर आकर्षित किया है।
रोजगार की नई उम्मीद बना रिंगाल
पलायन और बेरोजगारी से जूझ रहे पहाड़ में राजेंद्र बड़वाल ने रिंगाल को स्वरोजगार का मजबूत माध्यम बनाया है। उनके प्रयासों से अनेक लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिला है।
वे अब तक 10 हजार से अधिक लोगों को रिंगाल उत्पाद निर्माण का प्रशिक्षण दे चुके हैं। इनमें महिलाएं, युवा और स्वयं सहायता समूहों से जुड़े लोग भी शामिल हैं। प्रशिक्षण के माध्यम से कई परिवारों की आय बढ़ी है और पारंपरिक हस्तशिल्प को नया बाजार मिला है।
पर्यावरण संरक्षण का लोक आंदोलन
प्लास्टिक प्रदूषण आज दुनिया के सामने बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे समय में राजेंद्र बड़वाल रिंगाल उत्पादों को पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में स्थापित करने में जुटे हैं।
उनका संदेश स्पष्ट है—”प्लास्टिक हटाओ, रिंगाल अपनाओ।”
रिंगाल से बने उत्पाद प्राकृतिक, टिकाऊ, हल्के और पुनर्चक्रण योग्य होते हैं। यही कारण है कि वे लोगों को घरों, कार्यालयों और सार्वजनिक आयोजनों में प्लास्टिक की जगह रिंगाल के उत्पादों का उपयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।
देहरादून से मुंबई तक बनाई पहचान
राजेंद्र बड़वाल की कला अब गांव की सीमाओं तक सीमित नहीं है। वे देहरादून, दिल्ली और मुंबई सहित विभिन्न शहरों में प्रदर्शनियां लगा चुके हैं। उनके उत्पादों की मांग देश के कई राज्यों के साथ विदेशों तक पहुंच चुकी है।
उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए तो स्थानीय संसाधन भी वैश्विक पहचान हासिल कर सकते हैं।
गौरा देवी पुरस्कार : संघर्ष और समर्पण का सम्मान
गौरा देवी पुरस्कार केवल एक सम्मान नहीं, बल्कि उस सोच की पहचान है जो विकास और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलती है। राजेंद्र बड़वाल ने रिंगाल के माध्यम से यह साबित किया है कि पहाड़ के संसाधनों में रोजगार, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की अपार संभावनाएं छिपी हैं।
रिंगाल की पतली-पतली छड़ियों से सपनों को आकार देने वाले राजेंद्र बड़वाल की कहानी आज पहाड़ के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। यह कहानी बताती है कि विरासत को बचाकर भी विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है।

