
आयुर्वेदिक कंपनियों में बढ़ी मांग, उत्तराखंड में खेती और नर्सरी की अच्छी संभावनाएं
देहरादून/चमोली
औषधीय पौधों की खेती अब किसानों के लिए आमदनी का नया जरिया बनती जा रही है। कुटज, जिसे आम भाषा में इंद्र जौ या कूड़ा भी कहा जाता है, ऐसा ही एक पौधा है जिसकी आयुर्वेदिक बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है। इसकी छाल, बीज, पत्तियां और फूल तक औषधीय उपयोग में आते हैं। खास बात यह है कि उत्तराखंड के कई हिस्सों की जलवायु इस पौधे के लिए अनुकूल मानी जाती है। ऐसे में किसान यदि इसकी नर्सरी और खेती को अपनाएं तो यह भविष्य में कमाई का बेहतर साधन बन सकता है।
आलेख एवं शोधकर्ता जे.पी. मैठाणी के अनुसार कुटज के पौधे देहरादून और आसपास के वन क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से मिलते हैं। इन दिनों इसके पेड़ों पर गुच्छों में खिले सफेद फूल इसकी पहचान आसान बना रहे हैं। कुटज मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—मीठा इंद्र जौ और कड़वा इंद्र जौ। हालांकि व्यावसायिक उपयोग और उपलब्धता के लिहाज से कड़वा कुटज अधिक पाया जाता है।
कई रोगों में होता है उपयोग
कुटज को आयुर्वेद में बेहद उपयोगी पौधा माना जाता है। इसका उपयोग डायरिया, कफ, पाइल्स, पित्त विकार, रक्त विकार और त्वचा रोगों के उपचार में किया जाता है। बाजार में इसकी छाल और बीज की सबसे अधिक मांग बताई जाती है। यही कारण है कि औषधीय पौधों की खेती में कुटज अब धीरे-धीरे किसानों की पसंद बनता जा रहा है।
ताजे बीजों से बेहतर तैयार होती है पौध
विशेषज्ञों के अनुसार कुटज की पौध तैयार करने के लिए ताजे बीज सबसे बेहतर माने जाते हैं। पुराने बीजों में अंकुरण कम हो जाता है। बीजों को बोने से पहले करीब छह घंटे पानी में भिगोना और उसके बाद फफूंदनाशक उपचार करना जरूरी होता है। इससे पौध गलने और सड़ने की समस्या कम होती है।

कुटज की पौध तैयार करने के लिए मदर बेड या ट्रे में 60 प्रतिशत बालू, 20 प्रतिशत मिट्टी और 20 प्रतिशत सड़ी गोबर खाद का मिश्रण उपयुक्त माना गया है। बीज बोने के बाद ऊपर से जूट का बोरा, पराली या अखबार ढकने से नमी बनी रहती है और 10 से 12 दिन में अंकुरण शुरू हो जाता है।
पॉलीबैग में शिफ्ट करने के बाद बढ़ती है पौध
जब पौध में पांच से छह पत्तियां आ जाती हैं और उसकी ऊंचाई करीब तीन इंच हो जाती है, तब उसे पॉलीबैग में प्रत्यारोपित किया जाता है। इसके लिए 30 प्रतिशत मिट्टी, 30 प्रतिशत सड़ी गोबर खाद और 40 प्रतिशत बालू का मिश्रण उपयुक्त माना गया है।
पौधों का प्रत्यारोपण शाम के समय करना बेहतर रहता है। इसके बाद करीब 15 दिन तक शेड नेट की हल्की छाया देने से पौधे तेजी से विकसित होते हैं। सामान्य तौर पर छह से आठ महीने में पौध रोपण के लिए तैयार हो जाती है।
एक साल पुरानी पौध रोपण के लिए उपयुक्त
विशेषज्ञों के अनुसार खेत या खुले क्षेत्र में रोपण के लिए एक साल पुरानी पौध बेहतर मानी जाती है। इसके लिए 18x18x18 इंच का गड्ढा बनाकर उसमें चार से पांच किलो सड़ी गोबर खाद मिलानी चाहिए। पौधे से पौधे की दूरी 12 फीट और लाइन से लाइन की दूरी 15 फीट रखने पर पौधों का विकास अच्छा होता है।
कुटज का पौधा एक बार स्थापित हो जाने के बाद लंबे समय तक उत्पादन देता है। पांच साल बाद पौधों से बीज और फूल मिलने लगते हैं, जबकि आठ से दस साल बाद छाल भी आर्थिक रूप से उपयोगी होने लगती है।
नर्सरी से भी हो सकती है अच्छी आमदनी
कुटज केवल खेती के रूप में ही नहीं, बल्कि नर्सरी व्यवसाय के रूप में भी किसानों और युवाओं के लिए बेहतर विकल्प माना जा रहा है। जानकारी के अनुसार एक किलो बीज की कीमत करीब 800 रुपये तक होती है और इससे लगभग 3000 पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

एक पौध तैयार करने में करीब 20 से 25 रुपये की लागत आती है, जबकि एक साल पुरानी पौध 40 से 50 रुपये तक बिक सकती है। इस हिसाब से नर्सरी संचालक एक साल में अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं।
उत्तराखंड के लिए क्यों उपयुक्त है कुटज
जानकारों के अनुसार समुद्र तल से 300 मीटर से 1200 मीटर तक की ऊंचाई वाले क्षेत्र कुटज की खेती के लिए अनुकूल माने जाते हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड के कई हिस्सों में इसकी खेती और पौध उत्पादन की अच्छी संभावना है।
एक नाली भूमि में 25 से 30 पौधे लगाए जा सकते हैं। कुछ वर्षों बाद किसान बीज, पत्तियां, फूल और छाल से नियमित आय प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे में यह पौधा दीर्घकालिक आय का स्रोत बन सकता है।
ऐसे तैयार करें कुटज की पौध
- ताजे बीजों का करें चयन
- बीजों को 6 घंटे पानी में भिगोएं
- फफूंदनाशक से करें उपचार
- 60% बालू, 20% मिट्टी और 20% गोबर खाद का मिश्रण बनाएं
- ट्रे या क्यारी में बीज बोएं
- पानी का निकास बेहतर रखें
- 10 से 12 दिन में शुरू होता है अंकुरण
खेत में रोपण के समय रखें ध्यान
- एक साल पुरानी पौध लगाएं
- 18x18x18 इंच का गड्ढा बनाएं
- 4 से 5 किलो सड़ी गोबर खाद डालें
- पौधे से पौधे की दूरी 12 फीट रखें
- लाइन से लाइन की दूरी 15 फीट रखें
- शुरुआती दिनों में जल निकास का ध्यान रखें
फैक्ट फाइल
कुटज एक नजर में
- आम नाम : इंद्र जौ / कूड़ा
- उपयोग : औषधीय पौधा
- मुख्य मांग : छाल, बीज, पत्तियां, फूल
- उपयुक्त क्षेत्र : 300 से 1200 मीटर ऊंचाई
- पौध तैयार होने का समय : 6 से 8 माह
- उत्पादन शुरू : 5 वर्ष बाद
- छाल उपयोग योग्य : 8 से 10 वर्ष बाद
यहां मिल सकती है पौध
उत्तराखंड में कुटज की पौध कई संस्थाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही है। जानकारी के अनुसार चमोली और देहरादून में आगाज फेडरेशन, डाबर/जीवन्ति वेलफेयर एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से पौध उपलब्ध करा रहा है। इसके अलावा बागेश्वर, अल्मोड़ा तथा एफआरआई देहरादून की सेंट्रल नर्सरी में भी पौध मिलने की जानकारी दी गई है।

