उत्तराखंड में बसंत ऋतु के आगमन और चैत्र मास की संक्रांति के स्वागत में लोकपर्व फूलदेई की तैयारियां जोरों पर, बच्चों के द्वारा घरों की देहरी पर फूल डालकर और पारंपरिक लोकगीत गाकर उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। यह पर्व प्रकृति, परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति बच्चों के प्रेम को दर्शाता है ![]()
नौनिहाल ब्रह्म बेला में घरों की चौखटों पर बिखेरेंगे फूल, बसन्त आगमन का देंगे संदेश
लक्ष्मण सिंह नेगी
ऊखीमठ। चैत्र माह की संक्रान्ति से शुरू होने वाले उत्तराखण्ड के लोकपर्व फूलदेई को लेकर क्षेत्र में सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। पर्व को लेकर बच्चों और ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। परंपरा के अनुसार नौनिहाल ब्रह्म बेला में उठकर विभिन्न प्रजातियों के सुगंधित फूलों को एकत्रित करेंगे और गांव के प्रत्येक घर की चौखट पर फूल बिखेरकर सुख-समृद्धि तथा बसन्त ऋतु के आगमन का संदेश देंगे । ग्रामीण क्षेत्रों में इन दिनों जंगलों और बुग्यालों में खिले बुरांस, फ्यूंली, आड़ू तथा अन्य जंगली पुष्पों की सुगंध वातावरण को महका रही है। बच्चे इन्हीं फूलों को एकत्रित कर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए घर-घर जाकर चौखटों पर बिखेरते हैं। इस दौरान वे घर के सदस्यों के सुख, समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। बदले में गृहस्वामी बच्चों को गुड़, चावल, मिठाई या दक्षिणा देकर आशीर्वाद देते हैं। फूलदेई पर्व की धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यता भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। लोकविश्वास के अनुसार इस दिन देवी-देवताओं को पुष्प अर्पित करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। चौखट पर फूल बिखेरना शुभ माना जाता है और इसे प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। सांस्कृतिक दृष्टि से यह पर्व पहाड़ की समृद्ध लोक परंपराओं और प्रकृति से जुड़ी जीवन शैली का प्रतीक है। बच्चों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीतों में प्रकृति, ऋतुओं और जीवन के उल्लास का सुंदर वर्णन मिलता है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का माध्यम भी बनता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार फूलदेई का पर्व बसन्त ऋतु के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का उत्सव है। पर्व के माध्यम से लोग प्रकृति, वनस्पतियों और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी देते हैं। यही कारण है कि इस पर्व में फूलों का विशेष महत्व माना जाता है। नगर पंचायत अध्यक्ष कुब्जा धर्म्वाण का कहना है कि फूलदेई केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति, संस्कृति और लोकजीवन का अनूठा संगम है। पर्व के माध्यम से समाज में आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारे की भावना को भी मजबूती मिलती है। पर्व को लेकर क्षेत्र के गांवों में उत्सव जैसा वातावरण बना हुआ है और बच्चे ब्रह्म बेला में फूल बिखेरकर बसन्त के स्वागत के लिए उत्साहित हैं। हिमालयन ग्रामीण विकास संस्था के अध्यक्ष डा0 कैलाश पुष्वाण का कहना है कि फूलदेई त्यौहार में घोंघा नृत्य मुख्य आकर्षण माना जाता है तथा फूलदेई त्यौहार का समापन भी घोंघा विसर्जन व सामूहिक भोज की परम्परा युगों पूर्व की है। पाली सरूणा की पूर्व प्रधान प्रेमलता पंत, क्यूंजा घाटी कण्डारा निवासी विलोचना रावत व अगस्त्यमुनि निवासी दमयंती भट्ट का कहना है कि उत्तराखंड के गीतकारों, साहित्यकारों व संगीतकारों ने फूलदेई त्यौहार का वर्णन बड़े मार्मिक तरीखे से किया है तथा कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा फूलदेई त्यौहार को विशिष्ट पहचान दिलाने के लिए घोंघा प्रतियोगिताओ का आयोजन भी किया जा रहा है।
