
गोपेश्वर। उत्तराखंड में चल रहा मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान केवल मतदाता सूची का नियमित अपडेट नहीं रह गया है। इसके शुरुआती प्रभाव अब प्रदेश की चुनावी राजनीति में भी दिखाई देने लगे हैं। जिला मुख्यालय गोपेश्वर समेत कई नगर क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाता सत्यापन के दौरान अपने दर्ज पते पर नहीं मिल रहे हैं। दूसरी ओर, गांवों में मतदाताओं की संख्या बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। यदि यह रुझान जारी रहा तो 2027 के विधानसभा चुनाव का पूरा चुनावी गणित बदल सकता है।

चुनाव आयोग 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाकर विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चला रहा है। अभियान के दौरान बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन कर रहे हैं। गोपेश्वर सहित कई नगर क्षेत्रों में वर्षों पहले दर्ज कराए गए मतदाताओं में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो अब नौकरी, व्यवसाय या अन्य कारणों से दूसरे शहरों में बस चुके हैं। कई लोग सेवानिवृत्ति के बाद अपने पैतृक गांव लौट चुके हैं, जबकि कुछ परिवार स्थायी रूप से अन्य स्थानों पर चले गए हैं। ऐसे मतदाताओं के सत्यापन में कठिनाई आ रही है और नियमानुसार उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं।
इस बीच एक बड़ा बदलाव यह भी सामने आ रहा है कि अब लोग दो स्थानों पर मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने से बच रहे हैं। चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार एक व्यक्ति केवल एक ही स्थान का मतदाता हो सकता है और दोहरी प्रविष्टि पर कार्रवाई का प्रावधान है। यही कारण है कि नगरों में रहने वाले अनेक लोग अपने मूल गांव को स्थायी मतदाता केंद्र के रूप में चुन रहे हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर चुनावी रणनीतियों पर पड़ता दिखाई दे रहा है। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे संभावित दावेदारों ने गांवों में सक्रियता बढ़ा दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। राजनीतिक दल भी यह मानकर चल रहे हैं कि यदि ग्रामीण मतदाताओं की संख्या बढ़ती है तो चुनावी मुद्दों और प्रचार की दिशा भी बदलनी पड़ेगी।
पिछले पंचायत चुनाव में नगर क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों ने गांवों से चुनाव लड़ा था। कुछ मामलों में नगर और गांव दोनों स्थानों पर मतदाता सूची में नाम दर्ज होने के आरोप लगे, जिन पर न्यायालयों में मामले विचाराधीन हैं। इन घटनाओं ने भी लोगों को एक ही स्थान पर मतदाता के रूप में नाम दर्ज कराने के लिए प्रेरित किया है।
हालांकि, अंतिम तस्वीर एसआईआर अभियान पूरा होने और संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि उत्तराखंड का चुनावी भूगोल बदल रहा है। यदि शहरी क्षेत्रों में मतदाता घटते हैं और गांवों में संख्या बढ़ती है, तो 2027 का विधानसभा चुनाव पहले की तुलना में कहीं अधिक ग्रामीण मतदाताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित हो सकता है। ऐसे में राजनीतिक दलों और संभावित प्रत्याशियों की रणनीति भी गांवों की चौपालों और पगडंडियों से होकर गुजरती दिखाई दे रही है।

