
दूसरे क्षेत्रों के पर्वों के प्रति बढ़ रहा आकर्षण, लोक गायक दिगम्बर बिष्ट बोले—पहले पौष में मायके जाती थीं महिलाएं, हर ऋतु में गूंजते थे लोकगीत
केएस असवाल
चमोली / गौचर। पहाड़ की चौखट तक करवा चौथ पहुंच रहा है। बदलती जीवनशैली और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के बीच यह पर्व अब पहाड़ी गांवों में भी अपनी जगह बना रहा है। दूसरे क्षेत्रों की परंपराओं को अपनाने के साथ एक सवाल अपनी लोकसंस्कृति को लेकर भी उठ रहा है—क्या नई पीढ़ी पहाड़ के पारंपरिक पर्वों, लोकगीतों और रीति-रिवाजों से उतनी ही जुड़ी हुई है?
यह चर्चा करवा चौथ के विरोध की नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने की है। किसी पर्व को मनाना व्यक्तिगत आस्था और पसंद का विषय है, लेकिन अपनी परंपराओं को जानना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

लोक गायक दिगम्बर बिष्ट पहाड़ की पुरानी परंपराओं को याद करते हुए बताते हैं कि पहले पौष के महीने में महिलाएं मायके जाती थीं। हर ऋतु के साथ लोकगीतों की अपनी परंपरा जुड़ी होती थी और महिलाएं झुमेलू लगाती थीं। इन गीतों में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पहाड़ के सामाजिक जीवन, रिश्तों और भावनाओं की अभिव्यक्ति भी होती थी।
समय के साथ जीवनशैली बदली है। रोजगार और शिक्षा के लिए पलायन, परिवारों का बदलता स्वरूप और आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने गांवों के सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को प्रभावित किया है। दूसरी ओर, विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के बीच बढ़ते संपर्क से त्योहारों और परंपराओं का आदान-प्रदान भी हो रहा है। ऐसे में करवा चौथ जैसे पर्व पहाड़ के परिवारों में भी लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं।
लोकगीतों में बसती थी पहाड़ की आत्मा
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की विशेषता रही है कि यहां ऋतुओं, त्योहारों और सामाजिक अवसरों के अनुसार गीत गाए जाते थे। महिलाओं के सामूहिक गीत और झुमेलू आपसी मेल-मिलाप के साथ सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी थे। मायके जाने की परंपरा रिश्तों को मजबूत करती थी, वहीं लोकगीत इन संबंधों की भावनात्मक अभिव्यक्ति बनते थे।
आज चुनौती यह है कि नई पीढ़ी इन परंपराओं से परिचित रहे। गांवों में पारंपरिक गीतों को प्रोत्साहित करने, बुजुर्गों से लोकपरंपराओं की जानकारी जुटाने और बच्चों को स्थानीय संस्कृति से जोड़ने के प्रयास जरूरी हैं। सांस्कृतिक आयोजन और लोकगीतों के मंच इस विरासत को जीवंत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सवाल करवा चौथ का नहीं, सांस्कृतिक संतुलन का है
करवा चौथ मनाने और पहाड़ की परंपराओं को निभाने के बीच कोई विरोध नहीं है। नई परंपराओं को अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना भी संभव है। जरूरत इस बात की है कि दूसरे क्षेत्रों के पर्वों के प्रति बढ़ते आकर्षण के साथ उत्तराखंड के लोकपर्वों, झुमेलू और पारंपरिक रीति-रिवाजों को भी परिवारों तथा समाज में उचित स्थान मिले।
लोक गायक दिगम्बर बिष्ट की यादें उस सांस्कृतिक जीवन की ओर ध्यान खींचती हैं, जिसमें हर ऋतु के गीत और मायके जाने जैसी परंपराएं सामाजिक जीवन का हिस्सा थीं। इन परंपराओं को केवल अतीत की स्मृति बनाकर छोड़ने के बजाय नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।
आखिर संस्कृति की पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि हम कौन-से त्योहार मनाते हैं, बल्कि इससे भी बनती है कि हम अपनी विरासत को कितना जानते हैं और उसे आने वाली पीढ़ियों तक किस तरह पहुंचाते हैं। पहाड़ में करवा चौथ मनाया जाए या कोई दूसरा पर्व, अपनी लोकसंस्कृति का झुमेलू भी घर-आंगन में गूंजता रहे—यही सांस्कृतिक संतुलन की असली जरूरत है।

