ऊखीमठ : 41 वर्षों बाद बणसू गांव में गूंजे वैदिक मंत्र, नौ दिवसीय महायज्ञ पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न

Team PahadRaftar

भगवती राज-राजेश्वरी धाम में उमड़ी आस्था, केदार घाटी नौ दिनों तक रही भक्तिमय

लक्ष्मण नेगी

ऊखीमठ। प्रकृति की सुरम्य वादियों, सीढ़ीनुमा खेत-खलिहानों और पारंपरिक पहाड़ी संस्कृति के बीच बसे बणसू गांव ने इन दिनों एक दुर्लभ आध्यात्मिक क्षण को जिया। गांव स्थित भगवती राज-राजेश्वरी मंदिर परिसर में 41 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित नौ दिवसीय महायज्ञ पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न हो गया। इस आयोजन ने न केवल बणसू गांव, बल्कि समूची केदार घाटी को भक्ति, श्रद्धा और सांस्कृतिक चेतना से सराबोर कर दिया।

महायज्ञ के नौ दिनों तक मंदिर परिसर वेद मंत्रों, हवन-पूजन, धार्मिक अनुष्ठानों और जयकारों से गुंजायमान रहा। सुबह से लेकर देर शाम तक भक्ति और आस्था का ऐसा वातावरण बना रहा, जिसने गांव को एक जीवंत आध्यात्मिक धाम में बदल दिया। दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने यज्ञ में आहुति देकर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, लोककल्याण और विश्व शांति की कामना की।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह रही कि 41 वर्षों बाद गांव में इतने बड़े स्तर पर धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन हुआ, जिसने बुजुर्गों की स्मृतियों को ताजा कर दिया और नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक जड़ों और लोकपरंपराओं से जोड़ने का अवसर दिया। गांव के लोगों के लिए यह महायज्ञ सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक एकता और आस्था के पुनर्जागरण का भी पर्व बन गया।

महायज्ञ के दौरान ग्रामीणों की ओर से नौ दिनों तक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। गांव के हर परिवार की भागीदारी ने इस आयोजन को केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का स्वरूप भी दे दिया। आयोजन में सामूहिक श्रम, सेवा और समर्पण का जो भाव दिखा, उसने पहाड़ की साझी संस्कृति और सामुदायिक परंपरा को फिर जीवंत कर दिया।

समापन अवसर पर राज्य मंत्री चण्डी प्रसाद भट्ट ने मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचकर महायज्ञ की सराहना की। उन्होंने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करते हैं और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में जुटे ग्रामीणों, मंदिर समिति और सभी सहयोगकर्ताओं की प्रशंसा की।

महायज्ञ की पूर्णाहुति के साथ बणसू गांव में आध्यात्मिक संतोष, उल्लास और सांस्कृतिक गौरव का वातावरण दिखाई दिया। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं और महिलाओं तक, हर चेहरे पर इस आयोजन की संतुष्टि साफ झलक रही थी। यह आयोजन एक बार फिर साबित कर गया कि पहाड़ के गांवों में धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि वह लोकजीवन, संस्कृति, सामाजिक एकता और सामूहिक चेतना का जीवंत आधार है।

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