ऊखीमठ : जनवरी में बर्फ़ विहीन हिमालय, जलवायु परिवर्तन की खतरनाक चेतावनी

Team PahadRaftar

जनवरी में बर्फ़ विहीन हिमालय, जलवायु परिवर्तन की खतरनाक चेतावनी

लक्ष्मण नेगी 

ऊखीमठ : हिमालय को सदियों से भारत की जलवायु व्यवस्था की रीढ़ माना जाता रहा है। यह पर्वत श्रृंखला न केवल केदार घाटी में बहने वाली मन्दाकिनी सहित सहायक  नदियो का उद्गम स्थल है, बल्कि मानसून, जैव विविधता और करोड़ों लोगों के जीवन-यापन का आधार भी है। जनवरी  माह के तीसरे सप्ताह में हिमालय के बड़े हिस्सों में बर्फ़ का न दिखाई देना एक सामान्य मौसमी विचलन नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन की गंभीर और प्रत्यक्ष चेतावनी है।

सामान्यतः जनवरी का महीना हिमालय में अत्यधिक बर्फबारी का होता है। यही बर्फ़ गर्मियों में पिघलकर नदियों को जीवन देती है। किंतु इस वर्ष पश्चिमी हिमालय से लेकर मध्य हिमालय तक बर्फबारी में भारी कमी दर्ज की गई। कई ऊँचाई वाले क्षेत्र, जो आमतौर पर सफेद चादर से ढके रहते थे, अब नंगे और सूखे दिखाई दे रहे हैं। वैज्ञानिक इसे ग्लोबल वार्मिंग और बदलते पश्चिमी विक्षोभों का प्रत्यक्ष परिणाम मान रहे हैं।

पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्र का औसत तापमान वैश्विक औसत से तेज़ी से बढ़ा है। तापमान में मामूली वृद्धि भी बर्फ़ के स्वरूप को बदल देती है जहाँ पहले बर्फ गिरती थी, वहाँ अब बारिश हो रही है। इसका सीधा असर हिमनदों व  ग्लेशियरोंपर पड़ रहा है। कई छोटे हिमनद सिकुड़ चुके हैं और कुछ के अस्तित्व पर ही संकट मंडराने लगा है।  बर्फ़ विहीन हिमालय का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि मन्दाकिनी व सहायक  नदियों के जल स्तर पर भी भारी गिरावट देखने को मिल रही है।

हिमालयी राज्यों में रहने वाले स्थानीय समुदाय पहले ही इसके दुष्परिणाम झेल रहे हैं। सेब और अन्य नकदी फसलों की पैदावार घट रही है, चरागाह सूख रहे हैं और पारंपरिक जीवन शैली टूट रही है। पर्यटन पर भी असर पड़ा है जहाँ पहले बर्फ देखने पर्यटक आते थे, वहाँ अब निराशा हाथ लग रही है। यह आर्थिक संकट को और गहरा कर रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह परिवर्तन अब धीरे-धीरे नहीं, बल्कि तेज़ी से हो रहा है।

वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले दशकों में हिमालय के कई हिस्से स्थायी रूप से बर्फ़ विहीन हो सकते हैं।  इस स्थिति के लिए केवल प्राकृतिक कारणों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन, अंधाधुंध विकास, वनों का अत्यधिक दोहन, पहाड़ों में अवैज्ञानिक निर्माण और वाहनों की बढ़ती संख्या ने हिमालय को बेहद संवेदनशील बना दिया है। विकास के नाम पर किए जा रहे विस्फोट, सड़क चौड़ीकरण और सुरंग निर्माण प्राकृतिक संतुलन को और बिगाड़ रहे हैं। जनवरी में बर्फ़ विहीन हिमालय एक मौसमी समाचार नहीं, बल्कि भविष्य की झलक है। यदि आज चेतावनी को नहीं समझा गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ हिमालय को केवल तस्वीरों और किताबों में ही देख पाएँगी।

केदारघाटी के निचले इलाकों में भी मौसम के अनुकूल बारिश न होने से काश्तकारों की फसले काफी प्रभावित हो गयी है जबकि बर्फबारी के अभाव में पर्यटक स्थल देवरियाताल,  तुंगनाथ घाटी व कार्तिक स्वामी तीर्थ का पर्यटन व्यवसाय खासा प्रभावित हो गया है।  प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार के अनुसार जलवायु परिवर्तन की समस्या गम्भीर होती जा रही है तथा जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। उनका कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों के कारण कार्बन उत्सर्जन, वनाग्नि की घटनाओं के कारण वायु मण्डल की गैसे असन्तुलित होने के कारण वाष्पीकरण नहीं हो पा रहा है इसलिए जलवायु परिवर्तन की समस्या गम्भीर बनती जा रही है।

प्रोफेसर कविता भट्ट शैलपुत्री का कहना है कि मनुष्य  प्रकृति का हिस्सा है मगर प्रकृति का मालिक बन गया है। मानव द्वारा प्रकृति का अत्यधिक  दोहन, बढ़ते  प्रदूषण,  बुग्यालों में पॉलिथीन प्रयोग तथा विश्व स्तर पर समय – समय पर होने वाले युद्ध में बारूद का प्रयोग जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण माना जा रहा है।

 

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