चमोली : कागजों में दौड़ती सड़क, हकीकत में ठहरे कदम—डुमक-कलगोठ की 16 साल लंबी इंतजार कथा

Team PahadRaftar

कागजों में दौड़ती सड़क, हकीकत में ठहरे कदम—डुमक-कलगोठ की 16 साल लंबी इंतजार कथा

संतोष सिंह 

चमोली : उत्तराखंड के पहाड़ों में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को समझना हो तो डुमक-कलगोठ गांव की कहानी काफी है। 2007-08 में स्वीकृत सैंजीलग्गा-मैकोट-स्यूंण-डुमक 32 किमी मोटर मार्ग आज 16 साल बाद भी अधूरा है। फाइलों में सड़क पूरी है, लेकिन जमीन पर गांव तक आज भी पगडंडियां ही पहुंचती हैं।

संघर्ष की शुरुआत: “सड़क नहीं, वोट नहीं”

डुमक-कलगोठ और आसपास के गांवों के लोगों ने सड़क के लिए लंबा संघर्ष किया। वर्ष 2009 में जब निर्माण शुरू नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने लोकसभा चुनाव का विरोध करते हुए “सड़क नहीं, वोट नहीं” का नारा दिया। दबाव के बाद 2010 में करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से सड़क निर्माण शुरू हुआ। उम्मीद जगी कि अब गांव विकास की मुख्यधारा से जुड़ जाएगा, लेकिन यह उम्मीद जल्द ही अधूरी रह गई।

कागजों में पूरी सड़क, जमीन पर अधूरी हकीकत

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत 2016-17 में 23 किमी सड़क निर्माण पूरा दिखाकर भुगतान कर दिया गया। जबकि वास्तविकता यह है कि सड़क आज भी डुमक गांव से करीब 6 किमी पहले ही समाप्त हो जाती है।
सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम सिंह सनवाल कहते हैं, “कागजों में हमारे गांव तक सड़क पहुंच चुकी है, लेकिन हम आज भी पैदल हैं। आखिर यह कैसा विकास है?”

आपदा ने तोड़ी आखिरी उम्मीद

कुछ वर्षों तक स्यूंण तक वाहनों की आवाजाही शुरू हुई थी, लेकिन बाद में आपदाओं और रखरखाव के अभाव में सड़क जगह-जगह क्षतिग्रस्त हो गई। 2025 की आपदा के बाद सैंजीलग्गा-मैकोट-स्यूंण मार्ग भूमगदेरा सहित कई स्थानों पर पूरी तरह बंद हो गया। एक साल बीत जाने के बाद भी सड़क को खोलने का काम शुरू नहीं हो पाया है।

प्रकृति की गोद में बसा डुमक गांव 

आंदोलन, अनशन और थकती उम्मीदें

डुमक-कलगोठ के ग्रामीणों ने कई बार आंदोलन किए। वर्ष 2024 में जिला मुख्यालय गोपेश्वर में एक माह तक क्रमिक और आमरण अनशन भी किया गया। चुनाव के दौरान प्रशासन ने आश्वासन दिया कि चुनाव के बाद सड़क निर्माण शुरू होगा, लेकिन दो साल बाद भी हालात जस के तस हैं।

पैदल जिंदगी : रोज की मजबूरी

डुमक-कलगोठ आज भी ‘पैदल गांव’ के रूप में जाना जाता है। यहां के लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए 10 से 15 किमी पैदल चलना पड़ता है।
सबसे ज्यादा मुश्किल तब होती है जब कोई बीमार पड़ता है। हाल ही में एक 72 वर्षीय महिला को ग्रामीणों ने डंडी-कंडी के सहारे 8 किमी पैदल चलकर जिला अस्पताल पहुंचाया।

जनप्रतिनिधियों के दौरे, नतीजा शून्य

ग्रामीण बताते हैं कि कई मंत्री, विधायक और अधिकारी गांव का दौरा कर चुके हैं। यहां तक कि पूर्व चुनाव आयुक्त भी क्षेत्र का भ्रमण कर चुके हैं, लेकिन सड़क निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। दशोली ब्लॉक सदन में भी मामला उठाया गया, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

प्रशासन का पक्ष: ‘बजट का इंतजार’

पीएमजीएसवाई के अधिशासी अभियंता मनमोहन सिंह बिजल्वाण का कहना है कि सड़क खोलने के लिए बजट स्वीकृति हेतु प्रस्ताव भेजा गया है और जल्द कार्य शुरू किया जाएगा।

बड़ा सवाल: विकास किसके लिए?

डुमक-कलगोठ की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम पहाड़ी क्षेत्रों की है जहां विकास फाइलों में तो दौड़ता है, लेकिन जमीन पर कदम भी नहीं बढ़ा पाता।
जब सरकार डिजिटल इंडिया और विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है, तब डुमक-कलगोठ के लोग पूछ रहे हैं—क्या हम इस देश के नागरिक नहीं हैं?

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