चमोली : 12 हजार फीट की ऊंचाई पर आस्था का अनोखा संसार, जहां रक्षाबंधन पर ही लगता है भगवान वंशी नारायण का दरबार

Team PahadRaftar

रघुबीर नेगी | ज्योतिर्मठ

हिमालय की ऊंची और दुर्गम वादियों के बीच समुद्रतल से करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर एक ऐसा देवालय है, जिसकी परंपरा देश-दुनिया के दूसरे मंदिरों से बिल्कुल अलग है। उर्गम घाटी में स्थित भगवान वंशी नारायण मंदिर में रक्षाबंधन के दिन मानव समाज को विशेष पूजा-अर्चना का अधिकार प्राप्त है। इसी अनूठी परंपरा के कारण हर वर्ष रक्षाबंधन पर यहां आस्था का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

इस वर्ष भी रक्षाबंधन पर वंशी नारायण मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना हुई। दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भगवान वंशी नारायण को राखी अर्पित की और देश, समाज तथा अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। भगवान को सत्तू-बाड़ी और मक्खन का भोग लगाया गया। पूजा के बाद श्रद्धालुओं को सत्तू-बाड़ी और घी प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। कलगोठ के युवक मंगल दल और ग्रामीणों ने मंदिर परिसर में विशाल भंडारे का आयोजन किया।

सात किलोमीटर की कठिन चढ़ाई और फिर हिमालय की गोद में देवालय

वंशी नारायण तक पहुंचना अपने आप में एक आध्यात्मिक यात्रा है। उर्गम घाटी की ग्राम पंचायत देवग्राम के बांसा गांव से करीब सात किलोमीटर पैदल सफर तय करने के बाद मंदिर पहुंचा जाता है। रास्ते में हिमालय की विराटता, बुग्यालों की हरियाली और प्रकृति का अनछुआ सौंदर्य यात्रियों का साथ देता है।

देवग्राम से बांसा तक मोटर मार्ग निर्माण के बाद मंदिर की पैदल दूरी कुछ कम हुई है। हालांकि बरसात में सड़क और पैदल मार्ग की स्थिति यात्रियों के लिए चुनौती बनी रहती है। यही वजह है कि वंशी नारायण की यात्रा आज भी केवल पर्यटन नहीं, बल्कि आस्था, साहस और धैर्य की परीक्षा मानी जाती है।

नाम वंशी नारायण, स्वरूप भगवान विष्णु का

पहली नजर में मंदिर का नाम भगवान श्रीकृष्ण की वंशी से जुड़ा प्रतीत होता है, लेकिन मंदिर में भगवान विष्णु चतुर्भुज स्वरूप में विराजमान हैं। साथ ही भगवान गणेश और वन देवियों की प्रतिमाएं भी यहां मौजूद हैं।

कत्युरी स्थापत्य शैली में निर्मित यह मंदिर तराशे हुए पत्थरों की प्राचीन कला का उदाहरण है। मंदिर के आसपास मौजूद प्राकृतिक गुफाएं और दुर्गम हिमालयी भूगोल इसके रहस्य और आध्यात्मिक आकर्षण को और गहरा करते हैं।

रक्षाबंधन से क्यों जुड़ी है पूजा की परंपरा?

वंशी नारायण मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पूजा परंपरा है। इसके पीछे कई लोक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

लोकगाथाओं के अनुसार भगवान विष्णु जब वामन अवतार में राजा बलि के पास पहुंचे और तीन पग भूमि मांगी, तो दो पग में उन्होंने धरती और आकाश नाप लिया। तीसरे पग के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। इसके बाद भगवान नारायण राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए और उनके द्वारपाल बन गए।

भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। नारद के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली कि भगवान बलि के दरबार में हैं। रक्षाबंधन के दिन माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा और वरदान में भगवान विष्णु को मांग लिया। राजा बलि ने भगवान नारायण को मुक्त कर दिया।

स्थानीय लोककथा इस प्रसंग को वंशी नारायण मंदिर की पूजा परंपरा से जोड़ती है। कहा जाता है कि नारद की अनुपस्थिति में स्थानीय व्यक्ति द्वारा यहां भगवान की पूजा की गई। बाद में देवर्षि नारद ने मनुष्यों को वर्ष में एक दिन भगवान की पूजा का दायित्व सौंपा। तब से रक्षाबंधन के दिन मानव समाज द्वारा यहां पूजा किए जाने की परंपरा चली आ रही है।

आज भी कलगोठ गांव के पुजारी रक्षाबंधन पर भगवान वंशी नारायण की विशेष पूजा करते हैं।

पांडवों के अधूरे स्वप्न की कहानी

वंशी नारायण की कथा केवल विष्णु और राजा बलि तक सीमित नहीं है। मंदिर को पांडवों से जोड़ने वाली लोकमान्यता भी बेहद रोचक है।

कहा जाता है कि पांडव ऐसा विशाल मंदिर बनाना चाहते थे, जहां से बदरी और केदार दोनों धामों की एक साथ पूजा की जा सके। निर्माण कार्य रात में पूरा किया जाना था, लेकिन देवयोग से यह कार्य अधूरा रह गया। क्षेत्र में मौजूद विशाल शिलाखंडों को आज भी स्थानीय लोग भीम द्वारा लाए गए पत्थरों के रूप में देखते हैं।

इतिहास इन मान्यताओं की पुष्टि भले न करे, लेकिन हिमालयी समाज की लोकस्मृति में इन कथाओं का अपना विशेष स्थान है।

वामन पुराण में भी तपस्थली का उल्लेख

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वामन पुराण के 84वें अध्याय में वंशी नारायण क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। इसमें इस स्थान को अप्सराओं, गंधर्वों, किन्नरों, यक्षों, सिद्धों, चारणों और विद्याधरों से जुड़ी तपस्थली के रूप में वर्णित किया गया है।

यही कारण है कि वंशी नारायण केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि हिमालय की उस आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है, जिसमें प्रकृति और देवत्व एक-दूसरे से अलग नहीं माने जाते।

लोकजात यात्रा का पहला पड़ाव

उर्गम घाटी और पंचगैं की लोकजात यात्रा में भी वंशी नारायण का विशेष महत्व है। यह यात्रा का पहला प्रमुख पड़ाव माना जाता है। मंदिर से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर छोटा नंदीकुंड और स्वनूल कुंड स्थित हैं।

हर तीसरे वर्ष डुमक के वजीर देवता की छड़ी-निशान भी इस क्षेत्र तक पहुंचती है। इससे मंदिर की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता और बढ़ जाती है।

आरक्षित वन क्षेत्र की बंदिशें

वंशी नारायण मंदिर केदारनाथ वन प्रभाग के आरक्षित वन क्षेत्र में स्थित है और उर्गम वन पंचायत की सीमा से लगा हुआ है। आरक्षित वन क्षेत्र होने के कारण मंदिर में निर्माण, विकास और बुनियादी सुविधाएं विकसित करने में वन एवं सेंचुरी संबंधी नियम बड़ी चुनौती हैं।

विडंबना यह है कि जिस मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही बढ़ रही है, वहां आज भी ठहरने, पेयजल, शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।

छह महीने कपाट, लेकिन श्रद्धा बारह महीने

स्थानीय स्तर पर पिछले कुछ वर्षों से वंशी नारायण मंदिर के कपाट बदरीनाथ की तर्ज पर करीब छह माह के लिए खोले और बंद किए जा रहे हैं। हालांकि नियमित दैनिक पूजा की परंपरा यहां नहीं है। रक्षाबंधन ही वह दिन है, जब मानव समाज द्वारा विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है।

उर्गम घाटी से श्रद्धालु और पर्यटक वर्षभर इस क्षेत्र की ओर आते हैं। यही बढ़ती आवाजाही इस सवाल को भी जन्म देती है कि क्या धार्मिक आस्था और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए यहां न्यूनतम पर्यटन सुविधाएं विकसित नहीं की जा सकतीं?

सड़क पहुंच रही है, सुविधाएं अभी दूर

देवग्राम से बांसा तक सड़क बनने से वंशी नारायण की पहुंच पहले से आसान हुई है। दूसरा रास्ता हेलंग-उर्गम मोटर मार्ग से ल्यांरी, पल्ला, जखोला, किमाणा, कलगोठ और उच्छोंग्वाड़ होते हुए जाता है। इस मार्ग में करीब 10 किलोमीटर वाहन और छह किलोमीटर पैदल सफर करना पड़ता है। सड़क अभी निर्माणाधीन है और बरसात में इसकी स्थिति यात्रियों के लिए चुनौतीपूर्ण रहती है।

स्थानीय लोगों की मांग है कि मंदिर की धार्मिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए बुनियादी सुविधाओं की ऐसी व्यवस्था की जाए, जिससे श्रद्धालुओं को राहत मिले और हिमालयी पर्यावरण पर भी अतिरिक्त दबाव न पड़े।

देवग्राम के होमस्टे बन सकते हैं आधार

वंशी नारायण यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु कल्पेश्वर महादेव के दर्शन के बाद देवग्राम में होमस्टे की सुविधा ले सकते हैं। स्थानीय ट्रैकिंग समूहों के माध्यम से गाइड, पोर्टर और ट्रैकिंग उपकरण भी उपलब्ध कराए जाते हैं।

मंदिर में ठहरने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण यात्रियों को अपनी व्यवस्था स्वयं करनी पड़ती है। यही वजह है कि वंशी नारायण की यात्रा आज भी सामान्य धार्मिक पर्यटन से अलग अनुभव देती है।

हिमालय की चुप्पी में खड़ा यह मंदिर एक सवाल भी छोड़ता है—क्या विकास की दौड़ में हम उन परंपराओं और स्थानों की मौलिकता बचा पाएंगे, जिन्हें सदियों से स्थानीय समाज ने प्रकृति के साथ जीते हुए संरक्षित किया है?

वंशी नारायण की कहानी शायद इसी संतुलन की कहानी है—जहां एक दिन की पूजा के लिए हजारों फीट की चढ़ाई चढ़कर पहुंचने वाला इंसान प्रकृति के सामने खुद को छोटा महसूस करता है और आस्था उसे फिर उसी हिमालय से जोड़ देती है।

Leave a Reply

You May Like