ऊखीमठ : दस साल तक सड़क का इंतजार, अब ग्रामीणों ने खुद थाम लिया फावड़ा

Team PahadRaftar

मदमहेश्वर घाटी के बष्टी तोक में सरकारी तंत्र से निराश ग्रामीणों ने श्रमदान से शुरू किया मोटर मार्ग निर्माण, लोनिवि और वन विभाग को बार-बार अवगत कराने के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का आरोप

लक्ष्मण नेगी 

ऊखीमठ। पहाड़ में सड़क सिर्फ आवाजाही का साधन नहीं, बल्कि खेतों की उपज को बाजार तक पहुंचाने, मरीजों को अस्पताल ले जाने और गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की उम्मीद भी है। लेकिन जब इसी उम्मीद के लिए दस साल तक इंतजार करना पड़े, तो ग्रामीणों की परेशानी का अंदाजा लगाया जा सकता है। मदमहेश्वर घाटी की ग्राम पंचायत गैड़ का बष्टी तोक इसी हकीकत से जूझ रहा है। सड़क की मांग पर कार्रवाई नहीं होने से निराश ग्रामीणों ने मंगलवार को खुद श्रमदान कर मोटर मार्ग निर्माण का काम शुरू कर दिया।

बष्टी तोक के ग्रामीणों के लिए यह पहल केवल रास्ता बनाने की कोशिश नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही परेशानी से बाहर निकलने की जद्दोजहद है। सड़क नहीं होने से कृषि उत्पादों को बाजार तक पहुंचाना कठिन हो जाता है। खेतों में मेहनत से तैयार उपज को बाजार तक ले जाने में होने वाली दिक्कतों का असर ग्रामीणों की आजीविका पर भी पड़ता है।

बार-बार बताने पर भी नहीं हुई कार्रवाई

बष्टी गांव के प्रगतिशील काश्तकार बलबीर सिंह राणा का कहना है कि मोटर मार्ग निर्माण के संबंध में लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) और वन विभाग के अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन इसके बावजूद निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि लगातार इंतजार के बाद ग्रामीण स्वयं श्रमदान कर सड़क के लिए रास्ता तैयार करने को मजबूर हुए हैं।

ग्रामीणों की यह पहल उस मजबूरी को सामने लाती है, जिसमें बुनियादी सुविधा की मांग पूरी नहीं होने पर लोग अपने स्तर पर प्रयास करने लगते हैं। हालांकि, श्रमदान से शुरू किया गया काम सड़क की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। मोटर मार्ग को आगे बढ़ाने और उसे उपयोग योग्य बनाने के लिए संबंधित विभागों की भूमिका अहम होगी।

अब सवाल जिम्मेदारी का

दस साल से सड़क की राह देख रहे बष्टी तोक के ग्रामीणों को अब शासन-प्रशासन से ठोस कार्रवाई की उम्मीद है। उनकी मांग है कि मोटर मार्ग निर्माण की बाधाओं को दूर कर गांव को यातायात सुविधा से जोड़ा जाए, ताकि कृषि उत्पादों के विपणन और दैनिक आवागमन में राहत मिल सके।

बष्टी तोक की कहानी एक बड़ा सवाल छोड़ती है—दूरस्थ पहाड़ी गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को आखिर कब तक इंतजार करना पड़ेगा? अब देखना यह है कि ग्रामीणों के श्रमदान से शुरू हुई पहल के बाद संबंधित विभाग सड़क निर्माण को लेकर क्या कदम उठाते हैं।

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