नंदा देवी क्षेत्र में बढ़ी कस्तूरी मृग और भरल की आबादी, वैज्ञानिक निगरानी से सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े
संजय कुंवर देहरादून, 2 अक्टूबर। नंदा देवी जैव-विविधता क्षेत्र में कस्तूरी मृग, भरल और हिमालयी थार की आबादी तथा इनके फैलाव क्षेत्र में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ‘नंदा देवी चतुर्थ दशकीय जैव-विविधता अनुश्रवण अभियान-2026’ के दौरान जुटाए गए वैज्ञानिक आंकड़ों से उच्च हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के संकेत मिले हैं।

वन्यजीव सप्ताह-2026 के शुभारंभ अवसर पर एक अक्टूबर को आईसीएफआरई, देहरादून में अभियान के वैज्ञानिक निष्कर्ष जारी किए गए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति और वन मंत्री सुबोध उनियाल की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में अभियान पर आधारित पुस्तक और डाक्यूमेंट्री का भी विमोचन किया गया।
4200 मीटर की ऊंचाई तक वन्यजीवों की निगरानी
सात से 28 जून 2026 तक चले अभियान में करीब 4200 मीटर की ऊंचाई वाले उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन्यजीवों की निगरानी की गई। सर्वेक्षण में कस्तूरी मृग, भरल और हिमालयी थार की संख्या के साथ उनके वितरण क्षेत्र में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। अभियान दल ने क्षेत्र में पक्षियों की 125 प्रजातियों की पहचान की। परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कीटों की भी विविधता दर्ज की गई।
कैमरा ट्रैप और ड्रोन से जुटाया आंकड़ा
इस बार जैव-विविधता के वैज्ञानिक अनुश्रवण में कैमरा ट्रैप, ड्रोन, जीआईएस, सुदूर संवेदन और ऑप्टिकली स्टिम्युलेटेड ल्यूमिनेसेंस (ओएसएल) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। इन तकनीकों के माध्यम से दुर्गम उच्च हिमालयी क्षेत्रों में वन्यजीवों और पारिस्थितिकी से संबंधित आंकड़े जुटाए गए।
लाता से सरसोपाताल तक पहुंचा दल
अभियान की शुरुआत समुद्रतल से करीब 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित लाता गांव से हुई। दल लाताखरक, धरांसी, डिबरुगेटा, डियोड़ी, बिठारतोली, रामणी, भुजगाड़ और पटालखान जैसे दुर्गम क्षेत्रों से गुजरते हुए नंदा देवी पर्वत क्षेत्र के सरसोपाताल बेस कैंप तक पहुंचा। बेस कैंप करीब 5000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
अभियान प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) कपिल लाल के मार्गदर्शन में तथा नंदादेवी बायोस्फियर रिजर्व के निदेशक पंकज कुमार और तत्कालीन उप वन संरक्षक अभिमन्यु के नेतृत्व में संचालित हुआ। इसमें वन विभाग के साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान, जीबी पंत संस्थान, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय, आईटीबीपी और एसडीआरएफ की टीमों ने भागीदारी की। लाता, रेणी, पेंग और तोलमा गांव के ग्रामीणों ने भी अभियान में सहयोग किया।

