चमोली : हिमालय में प्रचुर मात्रा में खिला मां नंदा का प्रिय ब्रह्मकमल, बड़ी जात में इसी देवपुष्प से होती है पूजा

Team PahadRaftar

संजय चौहान

गोपेश्वर। मां नंदा की 12 वर्ष में आयोजित होने वाली बड़ी जात यात्रा जैसे-जैसे हिमालय की ऊंचाइयों की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे प्रकृति भी श्रद्धालुओं का स्वागत करती नजर आ रही है। इस बार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में मां नंदा के प्रिय माने जाने वाले देवपुष्प ब्रह्मकमल के प्रचुर मात्रा में खिलने से पर्यावरण प्रेमियों और प्रकृति प्रेमियों में खुशी है।

हिमालयी बुग्यालों का भ्रमण कर लौटे पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल, ट्रैकर मोहन दानू और हिमालयी क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से बकरी पालन करने वाले पालसियों के अनुसार इस वर्ष लंबे समय बाद उच्च हिमालयी क्षेत्र में बड़ी संख्या में ब्रह्मकमल खिला दिखाई दे रहा है। चमोली और रुद्रप्रयाग से लेकर पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों तक इसके खिलने की सूचना है। स्थानीय स्तर पर इसे कौंलु नाम से भी जाना जाता है।

ब्रह्मकमल को उत्तराखंड की लोक आस्था में विशेष स्थान प्राप्त है। नंदा की बड़ी जात, नंदाष्टमी और पहाड़ में आयोजित होने वाले विभिन्न नंदा पर्वों में इस देवपुष्प का धार्मिक महत्व माना जाता है। पंचकेदार क्षेत्र में भी श्रद्धालु इसे भगवान शिव को अर्पित करते हैं। नंदा की बड़ी जात में ब्रह्मकमल को महत्वपूर्ण प्रसाद के रूप में भी देखा जाता है।

रूपकुंड से फूलों की घाटी तक दिखी बहार

पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार इस बार रूपकुंड, भगुवासा, बदरीनाथ-नीलकंठ, चिनाप, फूलों की घाटी, हेमकुंड, नंदीकुंड, सप्तकुंड और छिपलाकेदार सहित कई उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ब्रह्मकमल खिला है। यह सामान्यतः ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम तापमान के बीच पाया जाता है और उत्तराखंड सहित हिमालयी क्षेत्र के कई हिस्सों में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है।

देवपुष्प को तोड़ने से बचें श्रद्धालु

बड़ी जात यात्रा के आगामी पड़ाव वेदनी बुग्याल, पातर नौचणियां, भगुवासा, रूपकुंड, थाला उली, शिला समुद्र और होमकुंड क्षेत्र हैं। इन उच्च हिमालयी क्षेत्रों में श्रद्धालुओं और ट्रैकिंग पर जाने वाले लोगों से ब्रह्मकमल को न तोड़ने की अपील की जा रही है।

पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि धार्मिक आस्था के नाम पर भी इस दुर्लभ पुष्प का अनियोजित दोहन नहीं होना चाहिए। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आवाजाही के बीच इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। प्रकृति और आस्था के इस अनूठे संगम को बचाने के लिए श्रद्धालुओं को ब्रह्मकमल को केवल निहारने और उसकी तस्वीर लेने तक सीमित रहना चाहिए।

क्या है ब्रह्मकमल

ब्रह्मकमल उच्च हिमालय में पाया जाने वाला पुष्प है। इसका वैज्ञानिक नाम सॉसूरिया ओबोवाटा बताया जाता है। यह एस्टेरेसी कुल से संबंधित पौधा है। उत्तराखंड में धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इसे विशेष महत्व प्राप्त है। अगस्त के आसपास इसके खिलने और बाद में फल बनने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी दी जाती है।

लोकमान्यताओं में ब्रह्मकमल को भगवान शिव और मां नंदा से जोड़कर देखा जाता है। महाभारत से जुड़ी कथाओं में भी हिमालय में खिलने वाले इस दिव्य पुष्प का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन धार्मिक कथाओं का आधार आस्था और लोकपरंपराएं हैं।

पर्यावरण प्रेमियों की अपील

बड़ी जात में शामिल श्रद्धालु और रूपकुंड सहित उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जाने वाले पर्यटक ब्रह्मकमल को न तोड़ें। हिमालय की जैव विविधता के संरक्षण के लिए इस देवपुष्प को प्राकृतिक रूप से खिलने और बीज बनने दिया जाए।

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