
पहाड़ रफ्तार टीम
गोपेश्वर। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर पूरा पहाड़ मां नंदा के जयकारों से नंदामय हो उठा है। बंड, दशोली और बधाण परगने ही नहीं, बल्कि पहाड़ के घर-गांवों में इन दिनों नंदा उत्सव की धूम है। मां नंदा देवी की बड़ी जात यात्रा के दौरान विभिन्न क्षेत्रों से निकली डोलियां अपने पड़ावों पर पहुंच रही हैं, जहां ग्रामीण पारंपरिक लोकगीतों, जागरों और जयकारों के साथ अपनी आराध्य देवी का भव्य स्वागत कर रहे हैं।
रविवार को मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली चरबंग से अगले पड़ाव मथकोट, कुरुड़ दशोली की नंदा डोली कुमजुग से लुणतरा और बंड क्षेत्र की नंदा डोली मैठाणा से बाटुला गांव पहुंची। पड़ावों पर ग्रामीणों ने ढोल-दमाऊं और पारंपरिक जागरों के बीच मां नंदा की डोली का स्वागत किया। देर शाम तक गांवों में नंदा के जयकारे और लोकगीत गूंजते रहे।
भारी बारिश पर भारी पड़ी आस्था
बंड क्षेत्र में रविवार को भारी बारिश के बावजूद मां नंदा की डोली की अगवानी के लिए श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। बारिश के बीच बंड की नंदा डोली अपने पहले पड़ाव मैठाणा से बाटुला गांव पहुंची। मार्ग में जगह-जगह ग्रामीणों ने डोली के दर्शन कर पूजा-अर्चना की और पारंपरिक तरीके से स्वागत किया। खराब मौसम भी श्रद्धालुओं की आस्था को नहीं डिगा सका।

बेटी को कैलास विदा करते छलकीं आंखें
नंदा की डोली को पड़ाव से अगले पड़ाव के लिए विदा करने का क्षण सबसे भावुक रहा। ध्याणियां अपनी मायके आई बेटी मां नंदा को विदा करते समय फफक-फफक कर रो पड़ीं। लोक परंपरा में मां नंदा को मायके आई बेटी का स्वरूप माना जाता है। इसी भाव के साथ ग्रामीण अपनी आराध्य देवी को कैलास के लिए विदा कर रहे हैं।
डोली के आगे बढ़ते ही कई ध्याणियों की आंखों से आंसू छलक पड़े। चेहरे पर मां के प्रति श्रद्धा और मन में बिछोह की पीड़ा साफ दिखाई दी। ग्रामीणों को इस बात की भी कसक है कि अब मां नंदा के अगले बड़े मिलन के लिए उन्हें 12 वर्ष का इंतजार करना होगा।
हर पड़ाव बन रहा नंदामय
मां नंदा की डोलियों के गुजरने के साथ ही पड़ावों पर उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है। कहीं जागर हो रहे हैं तो कहीं महिलाएं पारंपरिक नंदा गीत गाकर अपनी बेटी को विदा कर रही हैं। बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक हर कोई इस ऐतिहासिक यात्रा का साक्षी बन रहा है।
भारी बारिश के बीच उमड़ती आस्था, गूंजते नंदा के जयकारे और बेटी की विदाई पर छलकते आंसू—बड़ी जात यात्रा ने एक बार फिर पहाड़ की लोक संस्कृति, परंपरा और आस्था को जीवंत कर दिया है।
