चमोली : बदरीनाथ पर भाजपा की नजर, क्या दायित्वों की राजनीति से बदलेगा चुनावी गणित?

Team PahadRaftar

गोपेश्वर। उत्तराखंड की राजनीति में बदरीनाथ विधानसभा सीट हमेशा से प्रतिष्ठा और राजनीतिक संदेश का केंद्र रही है। चमोली जिले की इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा अधिक रहा है, जबकि भाजपा को यहां अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने बदरीनाथ सीट पर विशेष फोकस करना शुरू कर दिया है। हाल के महीनों में हुए दायित्व वितरण को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

हार के बाद बदली रणनीति

वर्ष 2024 के उपचुनाव में भाजपा को बदरीनाथ सीट पर करारी निराशा हाथ लगी थी। कांग्रेस प्रत्याशी लखपत बुटोला ने भाजपा उम्मीदवार और पूर्व विधायक राजेंद्र सिंह भंडारी को पराजित कर सीट बरकरार रखी थी। इस हार ने भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए थे, क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद भी पार्टी इस सीट को अपने पक्ष में नहीं कर सकी थी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उपचुनाव में मिली हार के बाद भाजपा ने यह महसूस किया कि केवल चुनावी प्रचार से बदरीनाथ की जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। इसके लिए क्षेत्रीय नेतृत्व को मजबूत करना और स्थानीय कार्यकर्ताओं को सम्मानजनक भागीदारी देना जरूरी है।

दायित्व वितरण में बदरीनाथ क्षेत्र की बढ़ी हिस्सेदारी

हालिया दायित्व वितरण पर नजर डालें तो बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र के नेताओं को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिली हैं। भाजपा नेत्री चंद्रकला तिवारी को राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष बनाया गया। जोशीमठ के माधव सेमवाल को चारधाम एवं बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) का सलाहकार और राकेश भंडारी को समिति का सदस्य नियुक्त किया गया।

गोपेश्वर की नंदी राणा को जनजाति आयोग का सदस्य बनाया गया, अतुल शाह को व्यवसायिक प्रकोष्ठ, जबकि नवल भट्ट को भाजपा लघु उद्योग प्रकोष्ठ का प्रदेश सह-संयोजक बनाया गया। पोखरी के डॉ. मातबर रावत को राज्य वन्यजीव सलाहकार बोर्ड में स्थान मिला। इससे पहले भी क्षेत्र के कई नेताओं को विभिन्न समितियों और परिषदों में जिम्मेदारी दी जा चुकी है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह महज संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश है। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि बदरीनाथ क्षेत्र के कार्यकर्ताओं और नेताओं को संगठन तथा सरकार में उचित प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है।

थराली और कर्णप्रयाग क्यों पीछे?

दूसरी ओर, चमोली जिले की थराली और कर्णप्रयाग विधानसभा सीटों के भाजपा नेताओं को अपेक्षाकृत कम दायित्व मिले हैं। कर्णप्रयाग क्षेत्र से रामचंद्र गौड़ और राजेंद्र प्रसाद डिमरी को जिम्मेदारियां मिली हैं, जबकि थराली क्षेत्र से रमेश गड़िया और बलवीर घुनियाल को विभिन्न समितियों में स्थान दिया गया है।

हालांकि इन नियुक्तियों को महत्वहीन नहीं कहा जा सकता, लेकिन संख्या और प्रभाव के लिहाज से बदरीनाथ क्षेत्र को मिली प्राथमिकता स्पष्ट दिखाई देती है। यही वजह है कि भाजपा के भीतर और बाहर दोनों जगह इस पर चर्चा हो रही है।

क्या यह चुनावी निवेश है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की नजर सिर्फ दायित्व वितरण पर नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक प्रभाव पर है। बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व को मजबूत कर भाजपा आगामी चुनावों के लिए मजबूत संगठनात्मक ढांचा तैयार करना चाहती है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी जिस तरह बदरीनाथ क्षेत्र के नेताओं को जिम्मेदारियां दे रही है, उससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी इस सीट को किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहती। भाजपा के लिए यह सीट सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि गढ़वाल मंडल में राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक भी है।

आगे की राह

फिलहाल दायित्व वितरण को लेकर भाजपा की रणनीति चर्चा में है, लेकिन असली परीक्षा चुनावी मैदान में होगी। सवाल यह है कि क्या दायित्वों के जरिए कार्यकर्ताओं को साधने और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने की यह कोशिश मतदाताओं को भी प्रभावित कर पाएगी?

बदरीनाथ विधानसभा सीट का इतिहास बताता है कि यहां का मतदाता स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व को प्राथमिकता देता है। ऐसे में भाजपा की यह रणनीति कितनी सफल होगी, इसका जवाब आने वाले चुनाव ही देंगे। लेकिन इतना तय है कि पार्टी ने बदरीनाथ सीट को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर रख दिया है।

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