
बगड़वाल नृत्य बना आकर्षण, 24 अक्टूबर को सारी गांव में लगेगा भव्य मेला
लक्ष्मण नेगी
ऊखीमठ। तृतीय केदार भगवान तुंगनाथ के शीतकालीन गद्दीस्थल मक्कूमठ में जगत कल्याण के लिए तपस्यारत भगवती नन्दा की धार्मिक यात्रा से तुंगनाथ घाटी भक्तिमय हो उठी है। देवी के गांव-गांव आगमन पर श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ स्वागत कर रहे हैं। ढोल-दमाऊं की गूंज और पारंपरिक बगड़वाल नृत्य के बीच क्षेत्र की लोकसंस्कृति और आस्था की अनूठी झलक देखने को मिल रही है।

काण्डा और हूण्डू गांवों के बाद भगवती नन्दा का उषाड़ा, दैड़ा और सारी गांव में भव्य स्वागत किया जाएगा। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, देवी 21 अक्टूबर को उषाड़ा, 22 अक्टूबर को दैड़ा और 23 अक्टूबर को पर्यटक गांव सारी पहुंचेगी। सारी गांव में 24 अक्टूबर को भव्य मेले का आयोजन होगा। मेले को लेकर ग्रामीणों और नन्दा देवी मेला समिति की ओर से तैयारियां की जा रही हैं।
25 अक्टूबर को भगवती नन्दा सारी गांव से विदा होकर मक्कूमठ पहुंचेगी। यहां पूजा-अर्चना के बाद देवी को उनके निर्धारित पूजा स्थल पर विराजमान किया जाएगा। देवी की विदाई के दौरान ग्रामीण पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भावपूर्ण विदाई देंगे।
बगड़वाल नृत्य में दिख रही लोकसंस्कृति की झलक
भगवती नन्दा के स्वागत में प्रस्तुत किया जा रहा पारंपरिक बगड़वाल नृत्य श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होकर लोकनृत्य और वाद्ययंत्रों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। देवी के जयकारों से गांवों का वातावरण भक्तिमय हो रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता हरेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि भगवती नन्दा का गांव में आगमन ग्रामीणों के लिए सौभाग्य का अवसर है। यह परंपरा क्षेत्र की धार्मिक पहचान को मजबूत करती है। पूर्व सूचना अधिकारी गजपाल भट्ट ने कहा कि बगड़वाल नृत्य तुंगनाथ घाटी की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हैं।
नन्दा देवी मेला समिति के अध्यक्ष जगदीश सिंह नेगी ने बताया कि सारी गांव में 23 और 24 अक्टूबर को होने वाले धार्मिक आयोजनों को लेकर उत्साह है। उन्होंने कहा कि भगवती नन्दा की विदाई के समय ग्रामीण भावुक हो जाते हैं और अगले वर्ष देवी के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। वन पंचायत सरपंच देवेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि देवी की यात्रा क्षेत्र की आस्था, सांस्कृतिक एकता और परंपराओं के संरक्षण का प्रतीक है।

