गौचर : कपड़ों के थान से कुदाल तक… ऑनलाइन बाजार ने छीना कारोबार तो मिट्टी में भविष्य तलाशने लगा राकेश

Team PahadRaftar

गौचर के झिरकोटी गांव के कारोबारी की कहानी पहाड़ के बदलते बाजार, टूटते स्थानीय कारोबार और बंजर होती जमीन के बीच नई उम्मीद की कहानी है

के.एस. असवाल

एक समय था जब राकेश चौहान की सुबह कपड़ों की दुकान खोलने से होती थी। दिनभर ग्राहकों को कपड़े के थान दिखाना, सूट और डिजाइन पसंद करवाना और शाम को बिक्री का हिसाब लगाना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी। दुकान सिर्फ कारोबार नहीं थी, बल्कि परिवार के भविष्य की उम्मीद भी थी।

फिर बाजार बदला

मोबाइल की स्क्रीन पर बाजार उतर आया। ग्राहक दुकान तक आने के बजाय घर बैठे कपड़े और दूसरी जरूरत का सामान मंगाने लगे। ऑनलाइन कंपनियों के बढ़ते कारोबार का असर छोटे कस्बों और गांवों के दुकानदारों पर पड़ा। राकेश का कपड़ों का कारोबार भी धीरे-धीरे सिमटता चला गया।

लेकिन राकेश ने हार नहीं मानी

उन्होंने दुकान के कमजोर पड़ते कारोबार के बीच अपने पूर्वजों की उस जमीन की ओर देखा, जो लंबे समय से बंजर होने की राह पर थी। जिस खेत को लोग छोड़ते जा रहे थे, राकेश ने उसी खेत में अपना नया भविष्य तलाशना शुरू कर दिया।

आज उनके हाथों में कपड़ों के थान नहीं, बल्कि कुदाल और दरांती हैं।

बंजर खेतों में उगने लगी उम्मीद

कर्णप्रयाग विकासखंड की न्याय पंचायत झिरकोटी के गांव निवासी राकेश चौहान ने मौसम के अनुसार फल, सब्जियों और फूलों की खेती शुरू की। शुरुआत आसान नहीं थी। खेत तैयार करने से लेकर बीज बोने, सिंचाई, निराई-गुड़ाई और फसल को बाजार तक पहुंचाने तक हर काम में मेहनत लगी।

लेकिन खेतों ने भी उनकी मेहनत का जवाब दिया

इस सीजन में राकेश करीब डेढ़ लाख रुपये की सब्जियां बेच चुके हैं। वहीं इस माह फूलों की बिक्री से करीब 10 हजार रुपये की आमदनी हो चुकी है। खेती से होने वाली आमदनी ने उन्हें यह भरोसा दिया है कि पहाड़ की जमीन केवल जीवन की याद नहीं, बल्कि रोजगार का आधार भी बन सकती है।

अपनी कमाई से आगे, गांव की महिलाओं तक पहुंचा रोजगार

राकेश की कहानी की एक और खास बात है। उन्होंने खेती को सिर्फ अपनी आमदनी का जरिया नहीं बनाया। गांव की स्थानीय महिलाओं को भी खेती के काम से जोड़ा। खेत में काम मिलने से महिलाओं को गांव में ही रोजगार का अवसर मिला।

यानी जिस कारोबार के कमजोर पड़ने से राकेश का रोजगार संकट में आया था, उसी संकट से निकलते हुए उन्होंने दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार का रास्ता तैयार किया।

दुकान में भविष्य तलाशने वाला आदमी अब खेत में भविष्य देख रहा है

राकेश के लिए यह बदलाव केवल पेशे का बदलाव नहीं है। यह बदलते समय के साथ खुद को बचाए रखने की कोशिश है।

वह बताते हैं कि छोटे व्यापारी अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाते हैं और चाहते हैं कि अगली पीढ़ी उनसे बेहतर जिंदगी जिए। लेकिन शिक्षा लगातार महंगी हो रही है और स्थानीय कारोबार के सामने ऑनलाइन बाजार की चुनौती बढ़ रही है।

ऐसे में छोटे कारोबारी के सामने सवाल सिर्फ दुकान चलाने का नहीं, बल्कि परिवार का भविष्य सुरक्षित रखने का भी है।

राकेश के हाथों में आज कुदाल है, लेकिन उनके सवाल बाजार व्यवस्था से हैं।

एक राकेश नहीं, पहाड़ के बदलते बाजार की कहानी

राकेश की कहानी को केवल एक व्यक्ति की सफलता की कहानी मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। यह पहाड़ के छोटे व्यापारियों और किसानों के सामने खड़ी दोहरी चुनौती को सामने लाती है।

एक तरफ ऑनलाइन बाजार ने स्थानीय दुकानों के सामने प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है। दूसरी तरफ खेती करने वाले लोगों के सामने जंगली जानवर, मौसम और बाजार जैसी चुनौतियां हैं।

पहाड़ के गांवों में कभी दुकान और खेत दोनों स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हुआ करते थे। आज दोनों ही दबाव में हैं।

राकेश ने फिलहाल अपनी जमीन को बचाकर एक रास्ता निकाल लिया है। लेकिन हर व्यापारी के पास खेत नहीं हैं और हर किसान के पास बाजार तक पहुंच नहीं है।

राकेश का सवाल, नीति बनाने वालों के लिए चुनौती

राकेश चाहते हैं कि स्थानीय छोटे व्यापारियों और किसानों को बचाने के लिए ठोस नीति बने। गांव की उपज को बेहतर बाजार मिले, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता मिले और छोटे कारोबारियों को बदलते बाजार के साथ खड़े होने के लिए सहयोग दिया जाए।

उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि रोजगार की तलाश में पहाड़ छोड़ना ही एकमात्र रास्ता नहीं है। अगर स्थानीय संसाधनों को बाजार और नीति का सहारा मिल जाए तो बंजर खेत भी रोजगार उगा सकते हैं।

कपड़ों की दुकान से खेत की मेड़ तक पहुंचा राकेश का सफर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक आदमी का संघर्ष तो है ही, साथ में पहाड़ के बदलते आर्थिक जीवन की तस्वीर भी दिखाई देती है।

कभी जिस हाथ ने ग्राहकों को कपड़ों के थान दिखाए थे, आज वही हाथ मिट्टी में बीज बो रहा है। कारोबार ने साथ छोड़ा तो राकेश ने जमीन का साथ पकड़ लिया। अब देखना यह है कि उनकी तरह कितने लोग अपनी मिट्टी में भविष्य तलाश पाते हैं और व्यवस्था उनके इस संघर्ष में कितनी मददगार साबित होती है।

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