रोपाई के साथ 11 दिवसीय बगडवाल नृत्य संपन्न, जीजा–स्याली की गाथा बनी मुख्य आकर्षण
रघुबीर नेगी की रिपोर्ट
चमोली : विकासखंड ज्योतिर्मठ के सनवैली क्षेत्र अंतर्गत पल्ला गांव में 11 दिनों से चल रहा पौराणिक बगडवाल नृत्य रोपाई के साथ विधिवत संपन्न हो गया। लंबे अंतराल के बाद आयोजित इस पारंपरिक अनुष्ठान में गांव समेत आसपास क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और आस्था व लोकसंस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला।

लोकमान्यता के अनुसार अंतिम दिन आछरियां (वन देवियां) और उनके परिवार का हरण कर लेती हैं, जिसके बाद परिवार पर संकट आ जाता है। कालांतर में जीतू बगडवाल अदृश्य रूप में अपने परिवार की सहायता करते हैं। यह पूरी लोकगाथा नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के माध्यम से जीवंत की गई।
वर्षा और समृद्धि से जुड़ा अनुष्ठान
ग्रामीणों के अनुसार बगडवाल नृत्य का आयोजन अच्छी वर्षा, भरपूर फसल और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। रोपाई का दिन भी की राशि के आधार पर तय होता है। वर्षों बाद मायके पहुंची सोबनी और मैतियों के मिलन का भावुक दृश्य आयोजन में विशेष आकर्षण रहा।
जीजा–स्याली की गाथा ने बांधा समां
बगडवाल नृत्य में और स्याली भरणा की रोचक कथा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। लोकगाथा के अनुसार, बांसुरी की मधुर धुन सुनकर स्याली भरणा ओखली में धान कूटते-कूटते ही अपने जीजा के पास पहुंच जाती है।

यहां हंसी-मजाक में स्याली भरणा द्वारा रखी गई शर्त—“न जिंदा मांस, न मरा हुआ”—कथा को नया मोड़ देती है। शर्त पूरी करने के प्रयास में जीतू बगडवाल जंगल में बांसुरी बजाते हैं, जहां उनकी धुन पर आछरियां मोहित हो जाती हैं और उन्हें अपने साथ ले जाने लगती हैं। बाद में आछरियां उन्हें लवटू (भेड़) देकर वचन निभाने का मार्ग देती हैं, जिसके बाद स्याली भरणा शर्त हारकर उनके साथ चल पड़ती है।
ढोल-दमाऊं की थाप पर जीवंत हुई परंपरा
पूरे आयोजन के दौरान ढोल-दमाऊं की गूंज और पारंपरिक वेशभूषा में कलाकारों के प्रदर्शन ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। गांव के बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई।
इस अवसर पर महावीर राणा (पश्वा घंटाकर्ण), रघुबीर सिंह (जीतू बगडवाल), मैता देवी (सोबनी), मुकेश रावत, प्रमोदू चाकर, जगदीश लाल, मौवू राम, राम लाल, पश्वा विश्वकर्मा, ढोलवादक महेंद्र लाल, संतोष लाल, धूम सिंह (अध्यक्ष), जगत सिंह, बिनोद सिंह, प्रकाश सिंह, बच्चू लाल (प्रधान), लक्ष्मी देवी, भवानी मनवर रावत सहित सैकड़ों ग्रामीण उपस्थित रहे।
आयोजन ने एक बार फिर साबित किया कि पहाड़ की लोकपरंपराएं आज भी जनमानस में जीवित हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
