चमोली : जब मायके आई ‘माँ’, और पूरे गांव की आंखें हो गईं नम

Team PahadRaftar

जब मायके आई ‘माँ’, और पूरे गांव की आंखें हो गईं नम

सरमोला में परंपरा, आस्था और धियानियों के भावनात्मक जुड़ाव की जीवंत कहानी

केएस असवाल 

चमोली : पहाड़ की संस्कृति में “मायका” सिर्फ एक स्थान नहीं, बल्कि भावनाओं का संसार होता है। और जब इसी मायके में देवी का आगमन होता है, तो वह उत्सव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक उत्सव बन जाता है। चमोली जिले के सरमोला गांव में हाल ही में ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला, जब माँ विजय चंडिका का आगमन और फिर विदाई पूरे गांव के लिए अविस्मरणीय बन गई।

परंपरा के अनुसार, विवाहित बेटियां—जिन्हें स्थानीय बोली में “धियाणी” कहा जाता है—अपने मायके में विशेष अवसरों पर एकत्रित होती हैं। इस आयोजन में भी दूर-दराज से आई धियानियों ने गांव को जीवंत कर दिया। वर्षों बाद सहेलियों से मिलना, बचपन की यादों को ताजा करना, खेत-खलिहानों और प्राकृतिक स्थलों की ओर लौटना—यह सब केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम है।

दिन भर गांव में उत्साह का माहौल रहा। धियानियों ने पारंपरिक परिधानों में लोकगीतों और नृत्यों के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। खेतों, “मंगेरा” जैसे प्राकृतिक जलस्रोतों और जन्मस्थली से उनका जुड़ाव स्पष्ट दिखा। यह दृश्य मानो समय को पीछे ले जाता हो।

रात होते-होते गांव भक्ति में डूब गया। सामूहिक कीर्तन, जागरण और मांगलिक गीतों के बीच पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। हर कोई इस आयोजन का हिस्सा बनकर खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहा था। सामूहिक भोज ने इस उत्सव को और भी आत्मीय बना दिया, जहां सभी वर्गों के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते नजर आए।

लेकिन हर उत्सव का एक अंत भी होता है—और वही सबसे अधिक भावुक क्षण होता है। 16 अप्रैल को जब माँ विजय चंडिका को गांव की सीमा खड़गोली से विदा किया गया, तो माहौल अचानक बदल गया। हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम थीं। धियानियों के चेहरे पर उदासी साफ झलक रही थी। यह केवल देवी की विदाई नहीं, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव का अंत था, जो कुछ दिनों के लिए पूरे गांव को एक सूत्र में बांध गया था।

गांव के बुजुर्गों ने इस मौके पर परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प भी दोहराया। उनका मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल आस्था को मजबूत करते हैं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी सुदृढ़ बनाते हैं। आपसी प्रेम, भाईचारा और सांस्कृतिक मूल्यों की जड़ें इन्हीं परंपराओं से मजबूत होती हैं।

यह आयोजन एक बार फिर यह याद दिलाता है कि पहाड़ की असली पहचान उसकी संस्कृति, उसकी धरोहर और उसके लोगों के भावनात्मक रिश्तों में बसती है। आधुनिकता के इस दौर में भी ऐसे आयोजन हमारी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं।

 

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